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________________ मापा ५७-५८ गृगाम्यान/६५ अन्य भी अपूर्वार्धकों को निवृत्त करता है।' तृतीय समय में भी यही क्रम है। विशेषता केवल यह है कि उन्हों अपूर्वस्पर्धकों को तथा अन्य भी अपूर्वस्पर्धकों को निर्वत करता है। जिस प्रकार संतीय समय में निरूपण किया गया है, उसी प्रकार प्रथम अनुभागकाण्डक का अन्तिम समय जब तक । उत्कीर्ण न हो जावे तब तक यही क्रम जानना चाहिए । - इसके अनन्तर काल में अनुभागसत्त्व में विशेषता इस प्रकार है संज्वलनलोभ में अनुभागसत्त्व सबसे कम है, इससे संज्वलनमाया में अनुभागसत्त्व अनन्तगुणा है। इससे संज्वलनमान में अनुभागसत्त्व अनन्तगुणा है, इससे संज्वलनक्रोध में अनुभागसत्त्व अनन्तगुणा है। इससे आगे सम्पूर्ण अश्वकर्मकरण के काल में भी यही क्रम है। अश्वकर्णकरण के प्रथम समय में निर्वतित अपूर्वस्पर्धक बहुत हैं, द्वितीय समय में निर्वतित अपूर्वस्पर्धक असंख्यातगुणित हीन हैं। तृतीय समय में निर्वतित पूर्वस्पर्धक द्वितीय समय से भी असंख्यातगुणित होन हैं। इस प्रकार उत्तरोत्तर समयों में जो अपूर्व-अपूर्व स्पर्धक निवृत्त किये हैं वे उत्तरोत्तर असंख्यातगुरिंगत हीन हैं। यहाँ पर गुरणाकार मूल्योपम का असंख्यातवा भाग है । अपनकर्णकरण के अन्तिम समय में लोभ के प्रथम अपूर्वस्पर्धक की अादिवर्गणा में अविभागप्रतिच्छेद अल्प हैं, द्वितीय अपूर्वस्पर्धक की आदिवर्गणा में अविभागप्रतिच्छेद दुगुने हैं। तृतीय अपूर्वस्पर्धक की आदिवर्गगणा में अविभागप्रतिच्छेद तिगुने हैं। इसी प्रकार चतुर्थ-पंचमादि अपूर्वस्पकों को आदिवर्गणाओं में चौगुने, पाँचगुने आदि अविभागप्रतिच्छेद जानने चाहिए। इसी प्रकार माया, मान और क्रोध के अपूर्वस्पर्धकों में अविभागप्रतिच्छेद जानने चाहिए । . अश्वकर्णकरण के अन्तिम समय में चारों संज्वलनों का स्थितिबन्ध आठ वर्ष और शेष कर्मों का स्थितिबन्ध संख्यातहजार वर्ष है। नाम. गोत्र और वेदनीय का स्थितिसत्त्व असंख्यातवर्ष है और चारों धातिया कर्मों का स्थितिसत्त्व संख्यातहजार वर्ष है। इस प्रकार अश्वकर्णकरण का काल श्रमाप्त होता है । यहाँ से अागे अनन्तर समय से लेकर चादरकृष्टिकरण काल है। हास्यादि छह कमी के जंक्रमण को प्राप्त होने पर जो क्रोधवेदककाल है, उस क्रोधवेदककाल के तीन भाग हैं 1 उसमें से प्रथम विभाग अश्वकर्णकरणकाल है. द्वितीयविभाग कृष्टिकरण काल और तृतीयविभाग कृष्टिवेदक काल है । अश्वकर्ण करण के समाप्त होने पर तदनन्तर काल में चारों संज्वलन कषायों का स्थिति म अन्तमहर्त कम आठवर्ष और शेष कर्मों का स्थितिबन्ध पूर्व के स्थितिबन्ध से संख्यातगुणा हीन है। प्रथम समयवर्ती कृष्टिकारक कोय के पूर्व स्पर्धकों से और अपूर्व स्पर्धकों से प्रदेशाग्र का अपकर्षण कर क्रोध-कृष्टियों को करता है। इसी प्रकार मान के स्पर्धकों से प्रदेशाग्र का अपकर्षण कर मानकृष्टियों को करता है, मायास्पर्धको से प्रदेशाग्र का अपकर्षण कर मायाकृष्टियों को करता है और सोमस्यर्थकों से प्रदेशाग्र का अपकर्षण कर लोभकृष्टियों को करता है। ये सब चारों कषायों की अष्टियां गणना की अपेक्षा एक स्पर्धक की वर्गणामों के अनन्तवें भाग प्रमाण है। क.पा. रिण मूत्र ५२७ से ५३० तक । २. क.पा. चूणिमूत्र ५३७ । ३, क.पा. चूशिसूत्र ५४१ । ४. क.पा. हरिणसूत्र ५४२-५५३ । ५. क.पा. चूणिसूत्र ५५४ से ५५७ । ६, क.पा. गिासूत्र ५७ मे ५८२ । क. पा. चणि सूत्र ५८३ से ५६० ।
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
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