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या ५६-५७
गुणस्थान / ६१
इस गुणस्थान मोही की ही लिया करता है और कितनी ही त्रकृतियों का प्रागे उपशम करेगा, इस अपेक्षा यह गुरास्थान औपशमिक है। कितनी ही प्रकृतियों का काय करता है तथा कितनी ही प्रकृतियों का श्रागे क्षय करेगा, इस दृष्टि से यह क्षायिक भी है।
शङ्का - क्षपक का स्वतन्त्र गुरणस्थान और उपशामक का स्वतन्त्र गुणस्थान इस प्रकार क-पृथक दो गुरणस्थान क्यों नहीं कहे गये ?
समाधान- नहीं, क्योंकि इस गुणस्थान के कारणभूत अनिवृत्तिरूप परिणामों की समानता दिखलाने के लिए उन दोनों ( क्षपक व उपशामक) में समानता बन जाती है अर्थात् उपशामक और आप इन दोनों के अनिवृत्तिपने की समानता है ।
दसवें गुरगस्थान तक सभी जीव कषायसहित होने के कारण, कषाय की अपेक्षा संयतों को 'यतों के साथ साता पाई जाती है, इसलिए दसवें गुणस्थान तक मंदबुद्धिजनों को संशय उत्पन्न की सम्भावना है, अतः संशय-निवारण के लिए संयत विशेषण देना श्रावश्यक है |
निवृत्तिकरण गुणस्थान में प्रवेश करने के प्रथम समय में सभी कर्मों के प्रस्तउपशाम साकरण, निवत्तीकरण और निकाचनाकरण युगपत् व्युच्छ्रिन्न हो जाते हैं । उनमें से जो कर्म कर्षण, उत्कर्षण और परप्रकृतिसंक्रमण के योग्य होकर पुनः उदीरणा के विरुद्ध स्वभावरूप से रिसात होने के कारण उदयस्थिति में अपकर्षित होने के प्रयोग्य है, वह अप्रशस्त उपशामना की प्रेमा उपशान्त कहलाता है और उसी का नाम अप्रशस्तोपशामनाकरण है । इसी प्रकार जो कर्म आकर्षण और उत्कर्षा की अविरुद्ध पर्याय के योग्य होकर पुनः उदय और परप्रकृति संक्रमणरूप न सके, वह निघत्तीकरण है । जो कर्म उदयादि ( उदय, परप्रकृतिसंक्रमण, उत्कर्षण, अपकर्षण ) के अयोग्य होकर अवस्थान में प्रतिबद्ध है, वह अवस्थान विशेष निकाचनकरण है। अनिवृत्तिगुणस्थान से पूर्व ये तीनों करण प्रवृत्तमान थे, किन्तु अनिवृत्तिकरण गुणस्थान के प्रथम समय खनकी व्युच्छित्ति हो जाती है । इन तीनों करणों के व्युच्छिन्न होने पर सभी कर्म श्रपकर्षण; संकर्षण, उदीरणा श्रौर परप्रकृतिसंक्रमण के योग्य हो जाते हैं ।
निवृत्तिकरण गुणस्थान में स्थितिबन्ध क्रम से घटते हुए पत्योपम के श्रसंख्यातवें भाग मारा हो जाता है। तत्पश्चात् संख्यात हजार स्थितिकाण्डकों के व्यतीत होने पर ज्ञानावरण. एनावरण और अन्तराय इन तीनों कर्मों की प्रकृतियों का अनुभागबन्ध क्रमशः देशघाती होने लगता देशात करने के बाद संख्यात हजार स्थितिबन्धों के व्यतीत होने पर अन्तरकरण होता है ।
विशेषता है कि क्षपकश्रेणी में जब अनिवृत्तिकररणगुणस्थान का संख्यात बहुभाग काल व्यतीत जाता है और संख्यातवाँ भाग शेष रह जाता है तब अन्तरकरण से पूर्व क्षपक दर्शनावरण की
द्वित्रिक का और नामकर्म की नरकगति आदि १३, इन सर्वे (१३३) १६ प्रकृतियों का करता है, उसके पश्चात् प्रत्याख्यानावरण व अप्रत्याख्यानावर रूप क्रोध, मान, माया. लोभ
कषायों का क्षय करता है, किन्तु कवायप्राभृत का उपदेश तो यह है कि पहले घाठ कपायों का करता है, तत्पश्चात् १६ प्रकृतियों का क्षय करता है। इन दोनों प्रकार के वचनों का संग्रह करने
पु. १ पृ. १०४, १०५ १६ १७ की टीका । २. ध. पु. १. १८५ |