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________________ ६२/गो. सा. जीवकाण्ड वाले के पापभीस्ता नष्ट नहीं होती है । इन दोनों वचनों में से कौनसा सत्य है, यह केवली या श्रुतकेवली ही जान सकते हैं, इस समय उसका निर्णय नहीं हो सकता। अन्तरकरण करने के पश्चात् क्षपक क्रमशः नपुसकवेद, स्त्रीवेद, छह नोकषाय, पुरुषवेद, संज्वल नक्रोध, संज्वलनमान, संज्वलनमाया, संज्वलन बादरलोभ का अनिवृत्तिकरण मुरास्थान में क्षय करता है, किन्तु उपशामक इन प्रकृतियों का उपशम करता है, इतनी विशेषता है कि संज्वलन के साथ साथ प्रत्याख्यानावरण और अप्रत्याख्यानावरण कषायों का भी उपशम करता है ।' अनिवृत्तिकररणगुणस्थान के अन्तिम-भाग में होने वाले कार्य पुन्वापुश्वरफड्डयवादरसुहुमगयकिट्टिअणुभागा । हीएकमाणंतगुणेरणवरादु वरं च हेतुस्स ॥५८।। गाथार्थ-पूर्वस्पर्धक से अपूर्व स्पर्धकों का अनुभाग, अपूर्वस्पर्धकों से बादरकृष्टि का अनुभाग और बादरकृष्टि से सूक्ष्मकृष्टि का अनुभाग क्रमशः अनन्तगुणा हीन होता है । पूर्व-पुर्व के जघन्य से उत्तर-उत्तर का उत्कृष्ट अनुभाग और अपने उत्कृष्ट से अपना जघन्य अनुभाग भी अनन्तगुणे हीनक्रम से होता है ।।५८॥ विशेषार्थ-अवेदी होने के प्रथम समय में चार संज्वलन कपायों का अनुभाग सत्त्व इसप्रकार है.--मानसंज्वलन में अनुभाग सबसे कम है, उससे क्रोध-संज्वलन में विशेष अधिक है, उससे मायासंज्वलन में विशेष अधिक है और उससे लोभ-संज्दल न में विशेष अधिक है । यहाँ पर विशेष अधिक का प्रमाण अनन्तस्पर्धक है । उस प्रथम समय में अश्वकर्णकरण करने के लिए जो अनुभागकाण्डक होता है उस अनुभागकाण्डक में त्रोध के स्पर्धक स्तोक हैं, इससे मान के स्पर्धक विशेष अधिक हैं, इससे माया के स्पर्कक विशेष अधिक हैं, इससे लोभ के स्पर्धक विशेष अधिक है । घात करने के लिए ग्रहण किये गये स्पर्धकों से अवशिष्ट अनुभागस्पर्धक लोभ संज्वलन में अल्प हैं, माया में उससे अनन्तगुरिणत हैं, मान में उससे अनन्तगुणित हैं और क्रोध में उससे अनन्तगुरिणत हैं । यह अश्वकर्णकरण के प्रथम समय की प्ररूपणा क. पा. चूर्तिणसूत्र ४.७६ से ४८६ (पृ.७८८) तक है । अश्वकर्णकरण, आदोलकर अपवर्तनोद्वर्तनाकरण ये तीनों एकार्थक नाम हैं । अश्वकर्ण अर्थात् जो परिणाम घोड़े के कान के समान क्रम से ही यमान होते हुए चले जाते हैं, उन परिणामों की अश्वकर्यकरण संज्ञा है । प्रादोल नाम हिंडोले का है । जिस प्रकार हिंडोले के स्तम्भ और रस्सी के अन्तराल में त्रिकोण आकार घोड़े के कर्ण (कान) के समान दिखता है, इसी प्रकार यहाँ पर भी क्रोधादि संज्वलन कषाय के अनुभाग का सनिवेश भी ऋम से घटता हुआ दिखता है, इसलिए इसे पादोलकरण भी कहते हैं। क्रोधादि संज्वलन कषायों का अनुभाग हानिवृद्धिरूप से दिखाई देने के कारण इसको अपवर्तनोद्वर्तनाकरग भी कहते हैं । (क. पा. सु. पृ. ७८७) अश्वकर्ण करण करने के उसी प्रथम समय में चारों संज्वलन कषायों के अपूर्वस्पर्धक करता है। [क. पा. चणिसूत्र ४६० | जिन स्पर्धकों को पहले कभी प्राप्त नहीं किया, किन्तु जो क्षपकश्श्रेणी में १. ध. पु. १ गूत्र २.७ की टीका।
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
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