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६०/ गो. सा. जीवकाण्ड
गाथा ५६-५७
'होंति अरिणयट्टिणी ते पडिसमयं जेस्सिमेक्कपरिणामा । विमलयर - कारण - हुयवह- सिहाहि णिद्दढ कम्म - वरणा ||५७|| ( जुम्मम् )
गाथार्थ -- एक ही काल (समय) में अवस्थित जीवों के जिस प्रकार संस्थान आदि की अपेक्षा भेद है. उसी प्रकार वे जोन परिणामों की अपेक्षा परस्पर निवृत्ति ( भेद ) को प्राप्त नहीं होते, थलएव वे निवृत्तिकरण कहलाते हैं । उनके प्रतिसमय उत्तरोत्तर अनन्तगुणी विशुद्धि से बढ़ता हुआ एकसा ही परिणाम होता है । वे परिणाम प्रति विमल ध्यानरूपी अग्नि की शिखाओं से कर्मरूप बन को जला डालते हैं ।। ५६-५७ ।।
विशेषार्थ- समान समयवर्ती जीवों के परिणामों की भेदरहित वृत्ति को श्रनिवृत्ति कहते हैं । अथवा निवृत्ति शब्द का अर्थ व्यावृत्ति भी है, अतएव जिन परिणामों की निवृत्ति अर्थात् व्यावृत्ति नहीं होती, उन्हें अनिवृत्ति कहते हैं । "
निवृत्तिकरण गुणस्थान वाले जितने भी जीव हैं वे सब प्रतीत, वर्तमान और भविष्यकाल सम्बन्धी किसी एक समय में विद्यमान होते हुए भी समान परिणाम वाले ही होते हैं और इसीलिए उन जीवों की गुणश्रेणी निर्जरा भी समान रूप से होती है । यदि एक समय स्थित अनिवृत्तिकरण गुणस्थानवालों को विसदृश परिणाम वाला कहा जाता है तो जिस प्रकार एक समय स्थित पूर्वकरण गुरणस्थान वालों के परिणाम विसदृश होते हैं, प्रतएव उनको अनिवृत्ति यह संज्ञा प्राप्त नहीं हो सकती है उसी प्रकार इन परिणामों को भी अनिवृत्तिकरण यह संज्ञा प्राप्त नहीं हो सकेगी।
शङ्खा -- अपूर्वकरणगुणस्थान में भी कितने ही परिणाम इस प्रकार के होते हैं अतएव उन परिणामों को भी अनिवृत्ति संज्ञा प्राप्त होनी चाहिए ।
समाधान- नहीं, क्योंकि उनके निवृत्तिरहित होने का कोई नियम नहीं है ।
शङ्का - इस गुणस्थान में जीवों के परिणामों की जो भेदरहित वृत्ति बनलाई है वह समान समयवर्ती जीवों के परिणामों की ही विवक्षित है, यह कैसे जाना जाता है ?
समाधान- - 'अपूर्व करा' पद की अनुवृत्ति से ही यह सिद्ध होता है कि इस गुरगुस्थान में प्रथमादि समयवर्ती जीवों का द्वितीयादि समयवर्ती जीवों के साथ परिणामों की अपेक्षा भेद है। इससे यह तात्पर्य निकल आता है कि 'अनिवृत्ति' पद का सम्बन्ध एकसमयवर्ती परिणामों के साथ ही हैं ।
शङ्का - जिनने परिणाम होते हैं, उतने ही गुणास्थान क्यों नहीं होते हैं ?
समाधान- नहीं, क्योंकि जितने परिणाम होते हैं, यदि उतने ही गुणस्थान माने जावें तो व्यवहार ही नहीं चल सकता, इसलिए प्रध्यार्थिक नय की अपेक्षा नियत संख्या वाले ही गुगास्थान कहे गये हैं ।
१. व. पु. १. १८६ सूत्र १७ की टीका; ३. घ. पु. १ पृ. २१८ सूत्र २७ की टीका ।
प्रा. पं. सं. १ मा २१ । २. ध. पु. १ पृ. १८३-१८४ ।