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पापा ७१४-७१५
पालाप/७७१ क्योंकि सम्यक्त्वी कभी घोनिनी में जन्म नहीं लेता,' जिससे कि नित्यपर्याप्तक योनिनी के भी सम्यक्त्व बन जाय । तथा शेष यानी तीसरे व पंचम गुरगस्थान में मुल मोघवत (रणस्थानों में कथन के समान ही) एक पर्याप्तालाप ही जानना चाहिए।
तेरिच्छियलद्धियपज्जते एक्को अपुण्ण पालावो ।
मूलोघं मणुसतिये मणुसिरिणप्रयदम्हि पज्जत्तो ॥७१४।। गाथार्थ-नियंच लब्ध्यपर्याप्तकों में एक अपूर्ण (अपर्याप्त) पालाप ही होता है। मनुष्यों म तीन में मूलोघ के समान बालार है। इन नो विशेषता है कि मनुपियनी के अविरत गुणस्थान में एक पर्याप्त ही पालाप होता है ||७१४॥
विशेषार्थ -मनुष्य चार प्रकार के होते हैं:- मनुष्य, मनुष्य पर्याप्त, मनयिनी और मनुष्य अपर्याप्त ।' वहाँ मनुष्य, मनुष्यपर्याप्त व मनुष्यिनी इन तीन के तो १४ गुणस्थान होते हैं। यदि यहाँ यह कहा जाय कि इस तरह तो मनुष्यनी के १४ गृगस्थान सिद्ध हो जाने से स्त्री को मुक्ति हो जाएगी, सो बात नहीं है: क्योंकि सचेल, मायाचारमयी व अपवित्र स्त्रियों को मुक्ति तो क्या, संयम भी सम्भव नहीं । यहाँ तो भाववेद का प्राधान्य है, द्रव्यवेद का नहीं । अत: उक्त तीन भेदों में १४ गुणस्थान बन जाने से गुणस्थान में सम्भव पालापों के समान ही पालाप हैं। शेष कथन सरल है ।
मणसिगि पमतविरदे पाडारदुगं तु गत्थि रिणयमेण ।
अवगदवेदे मणुसिरिण सणा भूदगविमासेज्ज ॥७१५।।
गाथार्थ -- मनुयिनी के प्रमत्तविरत गणस्थान में नियम से प्राहारद्विक नहीं है। अपगनवेद अवस्था में 'मनुपियनी' के जो मैथुनसंज्ञा कही है वह भूतगति न्याय की अपेक्षा कही है ।1७१५।।
विशेषार्थ- 'भावस्त्री व द्रव्यमाप' ऐसी मनुष्यनी में प्रमत्तविरत नामक छठे गणस्थान म आहारक शरीर व आहारक अंगोपांग का उदय नियम से नहीं हो सकता है ।
शङ्का-मरिपनियों के प्राहारक काययोग और ग्राहारक मिश्र काययोग नहीं होने का क्या कारण है ?
समाधान –यद्यपि जिनके भाव की अपेक्षा स्त्रीवेद और द्रव्य की अपेक्षा पुरुषवेद होता है, वे (भावस्त्रो) जीव भी संयम को प्राप्त होते हैं। किन्तु द्रव्य की अपेक्षा स्त्रीवेद वाले मनुष्य संयम को प्राप्त नहीं होते हैं। क्योंकि वे सत्रेल अर्थात् वस्त्र सहित होते हैं। फिर भी भाव की अपेक्षा स्त्रीवेदी और द्रक्ष्य की अपेक्षा पुरुषवेदी संयमधारी मनुष्यों के ग्राहारक ऋति उत्पन्न नहीं होनी है।
१. ध. १/३३६ एवं ध. १/२१०; प्रा. पं. सं. १/११६३ पृ. ४० नथा सं. पंचसंग्रह १/२६७ २. पट् ग्लं. १/८८ ब १/८५; घ. १/३२८, ३३० । ३. स. सि. १/७/१७ षट् पं. १/६३ ४.७.२/५०३ ५.५.२/५०४ मे ५३२ ६.घ. १/३३५ .२/५१५: योगसार प्रामत गाथा ४३ से ४६७, पत्थ भावेदेगा पयदंग दववेदेरण। घ. २/५१५ ८. देखें गो, जी. ७०८ में ७११ ।