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गाथा ७११-१२
मालाप/७६६
वह अपर्याप्ति नामकर्म हैनौर इसका सामानादि में उदय नहीं हो सकने से मासादनादि जीव लब्धिअपर्याप्तक अवस्था प्राप्त नहीं कर सकते ।'
शंका-तो फिर नित्यपर्याप्तक के वया पर्याप्ति नाम कर्म का उदय रहता है, क्योंकि, यहाँ निर्वृत्यपर्याप्तकों के तो सासादन आदि गुपस्थान बताये हैं ?
समाधान-हाँ, नित्यपर्याप्तक के भी पर्याप्ति नाम कर्म का उदय ही रहता है ।'
यहाँ यह शंका हो सकती है कि सयोगकेवली के भी नित्यपर्याप्त पालाप कहना चाहिए. मो क्यों नहीं कहा? सो ही कहा जाता है
जोगं पडि जोगिजिणे होदि हुणियमा अपुण्य गत्तं तु ।
प्रवसेसरावट्ठाणे पज्जत्तालावगो एषको ।।७११॥ गाथार्थ-योग की अपेक्षा ही सयोगीजिन में नियम से अपूर्णता यानी अपर्याप्तपना होता है (अर्थात् अपर्याप्त पालाम होता है)। शेष नव स्थानों में (नौ गुग्गस्थानों में एकमात्र पर्याप्तालाप ही होता है ।।७११।।
विशेषार्थ सयोगकेवली में भी अपर्याप्तालाप बन जाता है; पर वह योग की अपेक्षा ही सम्भव है। क्योंकि, सयोगकेवली का शरीर पूर्ण है और उनके पर्याप्ति नाम कर्मोदय भी विद्यमान है तथा काययोग भी है । अत: उनके अपर्याप्तता 'योग पूर्ण नहीं होने से ही गौणरूप से कही गई है अत: 'अपूर्णयोग की अपेक्षा केवली (सयोगी) को भी निर्वृत्यपर्याप्त कहा जा सकता है ।
चौदह मार्गगारों में पालाप नरक गति में पालाप सत्तण्ह पुढवीणं, प्रोधे मिच्छे य तिणि पालावा ।
पढमाविरदेवि तहा सेसाणं पुण्णगालावो ॥७१२॥ गाथार्थ-मातों ही पृथिवियों में, गुणस्थानों में से मिथ्यात्व गुणस्थान में तीनों पालाप होते हैं। प्रथम पृथिवी में अविरत गुणस्थान में भी बैसे हो अर्थात् तीनों पालाप हैं। शेष पृथिवी में (यानी द्वितीय से सप्तम नरक तक) अविरत गणस्थान में एक पर्याप्त पालाप ही होता है ।।७१२।।
विशेषार्थ–सर्व नरकों में नारकी मिथ्यात्व गुरणस्थान में पर्याप्त व अपर्याप्त दोनों अवस्थाओं में पाये जाते हैं, अतः सर्व पृथ्वी में मिथ्यात्व गुणस्थान में तीनों यालाए बन जाते हैं । प्रथम पृथ्वी में सम्यग्दृष्टि पूर्वकाल में नरकायु के बंध वश जन्म लेता है। अतः प्रथम पृथ्वी में पर्याप्त व अपर्याप्त दोनों अवस्थानों में सम्यक्त्व बन जाने में तीनों पालाप बन जाते हैं। शेष छह पृथ्वियों
१. घ. १/२७० या २६७; गो. जी. १२२; ध. ८/९; । २. स्वा. का. प्र. पृ. ७४ (भावार्थ) घ. १/२५६ एवं गो. जी. १२१ आदि। *ग्रौदारिकमिथकाययोगस्थ, काम काययोगस्य च सद्भाव एवापूर्णमांग इति । ३. प्रा. पं. सं. ११/गा. १६३/ पृ. ४१ तथा संस्कृत पं. सं. १:२६७, ५, १/२१० गा. १३३ । एवं घ. १/३३६ । ४. प्रपमायां पृथिव्यां पर्याप्तापर्याप्तकानां क्षाधिक क्षायोपशामिक चास्ति । म. मि.१/७|