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७६८/गो. सा. जीवकाण्ड
गाथा ७०८-७१०
समाधान—सामान्य और विशेष की अपेक्षा गुणस्थानों में, जीवसमासों में, पर्याप्तियों में, प्राणों में, संज्ञाओं में, इन्द्रियों में, कायों में, योगों में, वेदों में, कषायों में, ज्ञानों में, संयमों में, दर्शनों में, लेश्यानों में, भव्यों में, अभक्ष्यों में, सम्यक्त्वों में, संज्ञी-असंशियों में, आहारी-मनाहारियों में, और उपयोग में, पर्याप्त और अपर्याप्त विशेषणों से विशेषित करके जो जीवों की परीक्षा की जाती है, उसे प्ररूपणा कहते हैं।'
मुगास्थानों में पालाप
प्रोघे मिच्छबुगेवि य, प्रयदपमत्ते सजोगिठाणाम्म ।
तिण्णव य पालावा, सेसेसिक्को हवे रियमा ॥७०८।। गाथार्थ-गूगास्थानों में मिथ्यात्वद्विक तथा असंयत ब प्रमत्त एवं सयोगिस्थान में तीनों ही पालाप होते हैं । शेष में नियम से एक ही होता है ।।७०८।।
विशेषार्थ-मिथ्यात्व, सासादन, असंयत, प्रमत्तसंयत व सयोगीकेवली इन पांच गुणस्थानों में पर्याप्त, अपर्याप्त व सामान्य ये तीनों ही पालाप होते हैं । पर अवशिष्ट गुणस्थानों में पानी मिश्र, देश संयत, अप्रमत्तसंयत व अपूर्वकरणादि क्षीण कषायपर्यन्त ५ एवं अयोगीकेवली गुणस्थान इन नौ गुणस्थानों में एक पर्याप्त ही आलाप होता है। आगे आचार्य इसी के स्पष्टीकरणार्थ गाथा कहते हैं
सामरणं पज्जत्तमपज्जतं चेदि तिणि पालावा ।
दुधियप्पमपज्जत्तं लद्धीरिणवत्तगं चेदि ॥७०६।। गाथार्थ-सामान्य, पर्याप्त व अपर्याप्त इस प्रकार तीन पालाप हैं। पुनः अपर्याप्त पालाप के दो भेद होते हैं (१) लब्ध्यपर्याप्त (२) नित्यपर्याप्त १७०६।।
दुविहं पि अपज्जत्तं, प्रोघे मिच्छेव होदि रिणयमेण ।
सासरणप्रयदपमते णिव्यत्तिअपुरणगो होदि ॥७१०॥ गाथार्थ-दोनों ही प्रकार के अपर्याप्त पानाप (लब्ध्यपर्याप्त व नित्यपर्याप्त) सर्व गुणस्थानों में से मिथ्यात्व गुणास्थान में ही होते हैं । सासादन, असंयन व प्रमत्तसंयत इन तीन गुणस्थानों म नित्यपप्ति पालाप होता है ।।७१०।।
विशेषार्थ---यहाँ यह बताया गया है कि प्रथम गृणस्थान में ही दोनों प्रकार के अपर्याप्त आलाप होते हैं। क्योंकि, लब्ध्यपप्तिक मिथ्यात्वगुणस्थान में ही होते हैं। किञ्च, अपर्याप्ति नाम कर्म का उदय भी प्रथम गुणस्थान तक ही रहता है । इससे ग्रागे के गुरणस्थानों में नहीं।
शंका-अपर्याप्ति नाम कर्म क्या है ? समाधान-जिसके उदय से कोई भी पर्याप्ति पूर्ण नहीं हो अर्थात् लब्ध्यपयप्तिक अवरथा हो
१ घ. २/१ २. लद्धि अनुष्यं मिच्दथे । गो. नी. १२७। ३. गो. क. २६५ ।