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________________ गाथा ६६६ विधियुवसमसम्मत्तं श्रविरवसम्मादि संतमोहो-ति । खइगंसम्मं च तहा सिद्धोत्ति जिर्णोहि रिगद्दिट्ठ ॥ ६६६ ॥ प्रन्तर्भाव / ७५३ गाथार्थ - मिध्यात्व सासादन और मिश्र में अपना-अपना एक-एक गुणस्थान होता है । प्रथमोपशम सम्यक्त्व में और बेदक (क्षयोपशम ) सम्यक्त्व में असंयत सम्यग्दृष्टि चौथे गुणस्थान से लेकर अप्रमत्तसंयत सातवें गुणस्थान तक होते हैं ||६६५॥ द्वितीयोपशम सम्यक्त्व अविरत समयदृष्टि चौथे गुणस्थान से लेकर उपशान्तमोह ग्यारहवें गुणस्थान तक होता है। क्षायिकसम्यक्त्व भी अविरत सम्यग्दष्टि चौथे गुणस्थान से लेकर सिद्धों तक होता है ।। ६६६।। विशेषार्थ - क्षायिक सम्यष्टि श्रसंयत सम्यग्दृष्टि गुणस्थान से लेकर अयोगिकेवली गुणस्थान तक होते हैं ||१४५ यद्यपि सिद्धों में भी क्षायिक सम्यग्दर्शन होता है, किन्तु सिद्ध जीव गुणस्थानातीत हैं इसलिए इस सूत्र में उनको ग्रहण नहीं किया गया। क्षायिक सम्यग्दृष्टि के पर्याप्त काल में कापोत, पीत, पद्म और शुक्ल लेश्या होती है । २ क्षायिक सम्यग्दृष्टि मरकर प्रथम नरक में उत्पन्न हो सकता है। प्रथम नरक में कापोत लेश्या है इसलिए अपर्याप्त काल में कापोत लेश्या कही गई है। तीन शुभ लेश्या देवों में उत्पत्ति की अपेक्षा अपर्याप्त काल में क्षायिक सम्यग्दष्टि के होती है । शेष विशेषता भी विचार कर कहनी चाहिए। दूसरो पृथिवी से लेकर सातवीं पृथिवी तक नारकी जीव असंयत सम्यग्दष्टि गुरणस्थान में क्षायिक सम्यग्वष्टि नहीं होते हैं । तिर्यच संयतासंयत गुणस्थान में क्षायिक सम्यग्दष्टि नहीं होते ।" शङ्का - तिर्यंचों में क्षायिक सम्यग्दष्टि जीव संयतासंयत क्यों नहीं होते ? समाधान- नहीं, क्योंकि तिर्यंचों में यदि क्षायिक सम्यहष्टि जीव उत्पन्न होते हैं तो वे भोगभूमि में हो उत्पन्न होते हैं, दूसरी जगह नहीं। भोगभूमि में उत्पन्न हुए जीवों के अणुव्रत की उत्पत्ति नहीं हो सकती, क्योंकि वहाँ पर अणुव्रत के होने में आगम से विरोध आता है। योनिनी तियंचों के असंयतसम्यग्दृष्टि और संयतासंयत गुरणास्थान में क्षायिक सम्यग्दृष्टि नहीं होते । भवनवासी, वानव्यन्तर और ज्योतिषी देवों तथा उनकी देत्रियों और सौधर्म व ईशान कल्पवासी देवियों के असंयत सम्यष्टि गुणस्थान में क्षायिक सम्यग्दर्शन नहीं होता । " शंका- क्षायिक सम्यग्दर्शन उक्त स्थानों में क्यों नहीं होता ? दूसरे, जिन जीवों समाधान- नहीं, क्योंकि वहाँ पर दर्शनमोहनीय का क्षपण नहीं होता है। ने पूर्व पर्याय में दर्शनमोहनीय का क्षय कर दिया है उनकी भवनवासी आदि प्रथम देवों में और सभी देवियों में उत्पत्ति नहीं होती ।" मनुष्पगति में पर्याप्त मनुष्य के पर्याप्त व पर्याप्त अवस्था में १. सम्माडी २. धवल पु. २ पृ. ८११ । ५. धवल पु. १ पृ. ४०२ / पु. १ पृ. ४०६ । जम्मा-पडि जाव जोगिकेवलि नि ।। १४५ ।। " ३. धवल पु. १ पृ. ४०१ सूत्र १५५ । ४. धवल . १ पृ. ६. ध. पु. १ पृ. ४०३ सूत्र ९६१ ५. धवन पु. १ पृ. ४०६ मूत्र पु. १ पृ. ३६६ ] । ४०२ सूत्र ९५९ । १९३ । ८. धवल
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
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