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गाथा ६५५-६५६
सम्यक्त्वमागंणा/७१६
सद्दहरणासद्दहरणं जस्स य जीवस्स होइ तच्चेसु ।
विरयाविरयेण समो सम्मामिच्छोत्ति गायध्वो ॥६५५।।' गाथार्थ-जिस जीव के तत्वों में श्रद्धान और प्रश्रद्धान युगपत् प्रगट होता है, उसे विरताविरत के समान सम्यग्मिथ्याष्टि जानना चाहिए ।। ६५५।।
विशेषार्थ -इस गाथा में सम्यग्मिथ्याइष्टि का कथन है। गाथा २१ में भी सम्मारिमथ्या दृष्टि का कथन हो चुका है। अत: विशेष जानने के लिए गाथा २१ का विशेषार्थ देखना चाहिए।
मिथ्याटि का लक्षण मिच्छाइद्री जीवो उपाइपययणं ण सहहदि ।
सद्दहदि असम्भावं उवट्ठ वा अणुवइट्ठ॥६५६॥ गाथार्थ -मिथ्यादृष्टि जीब जिन-उपदिष्ट प्रवचन का तो श्रद्धान करता नहीं, किन्तु उपदिष्ट व अनुपदिष्ट असद्भाव का श्रद्धान करता है ।। ६५६।।
विशेषार्थ -यह गाथा गाथा नं. १८ के समान है अत: गाथा १८ का विशेषार्थ देखना चाहिए।
महदि प्रसन्भाव का अर्थ यह है कि मिथ्यादृष्टि जीब अपरमार्थ स्वरूप असद्भूत अर्थ का ही मिथ्यात्व के उदय से श्रद्धान करता है।
सम्यक्त्व मार्गणा में जीवसंख्या वासपुधत्ते खइया संखेज्जा जइ हवंति सोहम्मे । तो संखपल्लठिदिये केवदिया एवमणुपादे ॥६५७।। संखावलि-हिद-पल्ला खइया तत्तो य वेदमुवसमगा। प्रावलिप्रसंखगुरिणदा, असंखगुणहीरपया कमसो ॥६५५ ।। पल्लासंखेजदिमा सासरणमिच्छा य संखगुरिणदा हु। मिस्सा तेहि विहीणो, संसारी वामपरिमारणं ॥६५६।।
गाथार्थ-सोधर्म-शान स्वर्ग में पृथक्त्व वर्ष में संख्यात क्षायिक सम्यग्दृष्टि उत्पन्न होते हैं, तो संन्यात पल्य की स्थिति में कितने क्षायिक सम्यग्दष्टि उत्पन्न होंगे? इस प्रकार राशिक करने पर संख्यात पावली से भाजित पल्प प्रमाण क्षायिक सम्यग्दृष्टियों का प्रमाण प्राप्त होता है। इसको पावली के असंख्यातवें भाग से गुणा करने पर वेदक सम्यग्दृष्टियों का प्रमाण प्राप्त होता है। क्षायिक सम्यग्दृष्टियों से असंख्यात गुणे हीन उपणम सम्यग्दृष्टि जीव हैं ।। ६५७-६५८॥ नल्य के असंख्यातवें
१. प्रा. पं. सं. पृ.३६ गा. १६६ । प्रा.पं. सं. प ३६ गा.१००।
२. गो. जी. गाथा १८, धवल पृ. ६ पृ. ३४२, जयधवल पु. १२ पृ. ३२२,