SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 746
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ ७१२/गो. सा. जीवकाण्ड गाथा ६५१ धवलाकार ने भी कहा है कि पूर्वसंचित कर्मों के मलरूप पटल के अनुभाग स्पर्धक जिस समय विशुद्धि के द्वारा प्रति समय अनन्तगुणहीन होते हुए उदीरणा को प्राप्त किये जाते हैं, उस समय क्षयोपशम लब्धि होती है। प्राविमलद्विभवो जो भावो जीवस्स सावपहदीणं । सत्थाणं पयडीणं बंधणजोगो विसुद्धिसद्धी सो ॥५॥ [लग्थिसार] --क्षयोपशम लब्धि से उत्पन्न जीव के जो परिणाम साता आदि प्रशस्त प्रकृतियों के बन्ध के कारणभूत हैं वे विशुद्ध परिणाम विशुद्धि लब्धि हैं । धवलाकार ने भी कहा है कि प्रति समय अनन्तगुणित हीनक्रम से उदीरित अनुभाग स्पर्धकों से उत्पन्न हुना, साता ग्रादि शुभ कर्मों के बन्ध का निमित्तभूत और असातादि अशुभ कर्मों के बन्ध का विरोधी जो जीव का परिणाम है, उसे विशुद्धि कहते हैं। उसकी प्राप्ति का नाम विशुद्धि लब्धि है। छद्दवरणवपयत्थोपदेसयर-सूरिपहुवि लाहो जो। देसिदपदस्थधारण लाहो वा तदियलद्धो दु॥६॥ [लब्धिसार] -छह द्रव्य और नव पदार्थ का उपदेश करने वाले प्राचार्यादि का लाभ अथवा उपदिष्ट पदार्थों के धारण करने की शक्ति की प्राप्ति तीसरी देशना लब्धि हैं। धवलाकार ने भी कहा है कि छह द्रव्य और नौ पदार्थों के उपदेश का नाम देशना है । उस देशना से परिणत आचार्य आदि की उपलब्धि को और उपदिष्ट अर्थ के ग्रहण , धारण तथा विचारण की शक्ति के समागम को वेशना लब्धि कहते है। प्रतो कोडाकोडी विद्वारो ठिदिरसाण जं करणं । पाउग्गलद्धिणामा भस्वाभब्वेमु सामण्णा ॥७॥ [लब्धिसार] —पूर्वोक्त तीन लब्धि युक्त जीव प्रतिसमय विशुद्धि में वृद्धि होने के कारण प्रायु के अतिरिक्त शेष सात कर्मों की स्थिति काट कर अन्तः कोडाकोडी मात्र कर देता है और अप्रणास्त कर्मों का अनूभाग द्विस्थानिक अर्थात लता दारु रूप कर देता है। इस योग्यता की प्राप्ति प्रायोग्य लब्धि है। धवलाकार ने भी कहा है कि सर्व कर्मों की उत्कृष्ट स्थिति और अप्रशस्त प्रकृतियों के उत्कृष्ट अनुभाग को घात करके क्रमशः अन्तः कोडाकोड़ी स्थिति में और द्विस्थानीय अनुभाग में प्रवस्थान करने को प्रायोग्य लब्धि कहते हैं। क्योंकि इन अवस्थाओं के होने पर जीव करण लब्धि के योग्य होते हैं । प्रारम्भ की ये चारों लब्धियाँ भव्य और प्रभव्य जीवों के साधारण हैं, क्योंकि दोनों ही प्रकार के जीवों में इन चारों लब्धियों का होना सम्भव है। किन्तु अधःकरण, अपूर्वकरण और अनिवृत्तिकरण ये तीनों करण भव्य मिथ्या दृष्टि जीव के ही होते हैं, क्योंकि अन्यत्र वे पाये नहीं जाते ।' ४. घ. पु. ६ पृ. २०४-२०५ । ५. पवन पु. ६ पृ. २०५। ६. धवल १.२.३. धवल पु. ६ पृ. २०४। पृ. ६ पृ. १३६ ।
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
JainGPT.orgInstagram
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy