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________________ सम्यक्त्वमाला / ७१३ प्रथमोपशम सम्यक्त्व को प्राप्त होने वाले जीव के प्रघःप्रवृत्तकरण, अपूर्वकरण और निवृत्तिकरण के भेद से तीन प्रकार की विशुद्धियां होती हैं ।" प्रधःप्रवृत्त लक्षण वाली विशुद्धियों की 'अधःप्रवृत्तकरण' यह संज्ञा है, क्योंकि उपरितन समयवर्ती परिणाम अधः अर्थात् अश्वस्तन समयवर्ती परिणामों में समानता को प्राप्त होते हैं, इसलिए अधःप्रवृत्त यह संज्ञा सार्थक है । गाथ। ६५०-६५१ जिस करण में विद्यमान जीव के करण परिणाम 'अध:' अर्थात् नीचे [ उपरितन ( आगे के ) समय के परिणाम नीचे ( पूर्व ) के समय के परिणामों के समान] प्रवृत्त होते हैं वह अधःप्रवृत्तकरण है। इस करण में उपरिम समय के परिणाम नीचे के समय में भी पाये जाते हैं, यह तात्पर्य है । जिस करण में प्रत्येक समय में अपूर्व अर्थात् असमान होते हुए, नियमतः अनन्तगुण रूप से वृद्धिगत करण अर्थात् परिणाम होते हैं, वह अपूर्वकरण है। इस करण में होने वाले परिणाम प्रत्येक समय में असंख्यात लोक प्रमासा होकर अन्य समय में स्थित परिणामों के सदृश नहीं होते हैं । जिस करण में विद्यमान जी के एक समय में परिणामभेद नहीं है, वह अनिवृत्तिकरण है । समए समए भिण्णा भावा तम्हा प्रपुबकरणो हु । प्रणिट्टीवि तहं वि य परिसमयं एक्कपरिणामो ||३६|| [ लब्धिसार ] समय-समय में जीवों के परिणाम जुदे जुदे ही होते हैं, ऐसे परिणामों का नाम अपूर्वकर है और जहां प्रत्येक समय में एक ही परिणाम हो, वह अनिवृत्तिकरण है। -- करा नाम परिणाम का है। अपूर्व जो करण होते हैं वे प्रपूर्वकरण हैं, जिसका अर्थ समान परिणाम होता है।" निवृत्तिकरण में एक-एक समय के प्रति एक-एक ही परिणाम होता है, क्योंकि यहाँ एक समय में जघन्य और उत्कृष्ट परिणामों के भेद का प्रभाव है । " इन तीनों करणों के काल से ऊपर (आगे) उपशमन काल होता है। जिस काल विशेष में दर्शन मोहनीय उपशान्त होकर अवस्थित होता है. वह उपमानादा है। अर्थात् उपशम सम्यग्दृष्टि का काल है 15 शङ्का - दर्शनमोहनीय का उपशम किसे कहते हैं ? समाधान---करण परिणामों के द्वारा निःशक्त किये गये दर्शनमोहनीय के उदय रूप पर्याय के बिना अवस्थित रहने को उपशम कहते हैं । "तमुत्तमद्ध सवोवसमेरा होइ उवसंतो" ।। पूर्शर्ध गा. १०३ ।। * १. धवल पु. ६ पृ. २१४ । २. धवल पु. ६ पृ. २१७ १ ६. व ७. घदल पु. ६ पू. २२१ । पु. १२ पृ. २३४ । पु. १२ पृ. ३१४ । २. जयधवल पु. १२ पृ. २३३ । म. जयधवल पु. १२ पृ. २३४ । ४. व ५. जयश्वल ६. जयघवल
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
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