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________________ गाथा ६२६ सम्यक्त्वमार्गणा/६६१ उत्कृष्ट रूप से एकसौ पाठ जीव क्षपक गुणस्थान को प्राप्त होते हैं। विशेष का प्राश्रय लेकर प्ररूपणा करने पर प्रथम समय में एक जीव को आदि लेकर उत्कृष्ट रूप से बत्तीस जीव तक क्षपक श्रेणी पर चढ़ते हैं। दूसरे समय में एक जीव को प्रादि लेकर उत्कृष्ट रूप से अड़तालीस जीव तक क्षपक्रश्श्रेणी पर चढ़ते हैं। तीसरे समय में एक जीव को प्रादि लेकर उत्कृष्ट रूप से साठ जीव तक क्षपक श्रेणी पर चढ़ते हैं। चौथे समय में एक जीव को आदि लेकर उत्कृष्ट रूप से बहत्तर जीव तक क्षपकश्रेणी पर चढ़ते हैं। पाँचवें समय में एक जीव को आदि लेकर उत्कृष्ट रूप से चौरासी जीव तक क्षपकश्रेणी पर चढ़ते हैं। छठे समय में एक जीव को श्रादि लेकर उत्कृष्ट रूप से छयानवे जीव तक क्षपकवेशी पर चढ़ते हैं। सातवें और आठवें समय में एक जीव को आदि लेकर उत्कृष्ट रूप से प्रत्येक समय में एक सौ आठ जीव तक क्षपकश्रेणी पर चढ़ते हैं।' सयोग केवली की संख्या अट्ठव सयसहस्सा प्रहारण उदी तहा सहस्साणं । संखा जोगिजिरगाणं पंचसयविउत्तरं चंदे ।।६२६॥ गाथार्थ-- योगिजिनों की संख्या आठ लाख अठानवे हजार पाँचसौ दो है। इनकी मैं वन्दना करता हूँ ।। ६२६।। (यह दक्षिण मान्यता है।) विशेषार्थ--पाठ समय अधिक छह माह के भीतर यदि पाठ सिद्धसमय प्राप्त होते हैं तो चालीस हजार आठ सौ इकतालीस मात्र अर्थात् इतनी बार पाठ समय अधिक छह माह के भीतर कितने सिद्धसमय प्राप्त होंगे? इस प्रकार राशिक करने पर (४०६४१४८) तीन लाख छब्बीस हजार सातसी अट्ठाईस (३२६७२८) सिद्धसमय प्राप्त होते हैं । छह सिद्धसमयों में तीन-तीन जीव और दो समयों में दो-दो जीव यदि केवलज्ञान उत्पन्न करते हैं, तो पाठ समयों में संचित हुए योगिजिन बावीस (२२) होते हैं। यदि पाठ सिद्धसमयों में बावीस सयोगी जिन प्राप्त होते हैं तो तीन लाख छब्बीस हजार सात सौ अट्ठाईस (३२६७२८) सिद्धसमयों में कितने सयोगी प्राप्त होंगे। इस प्रकार त्रैराशिक करने पर (३२६७२८.:-८४२२) आठ लाख अट्ठानवे हजार पाँच सौ दो (८९८५०२) सयोगी जिन प्राप्त हो जाते हैं। जहां पर पहले के सिद्धकाल का अर्ध मात्र सिद्धकाल प्राप्त होता है वहाँ पर इस प्रकार राशिक होती है। पाठ सिद्धसमयों में यदि चवालीस सयोगी जिन प्राप्त होते हैं तो एक लाख त्रसठ हजार तीनसा चौसठ सिद्धसमयों में कितने सयोगी जिन प्राप्त होंगे, इस प्रकार राशिक करने पर पूर्वोक्त ८९८५०२ सयोगी जिनों की संख्या प्राप्त हो जाती है। अथवा जहाँ पूर्वसिद्धकाल का चौथा भाग ८१६८२ सिद्धसमय प्राप्त होते हैं वहाँ पर इस प्रकार राणिक होती है। पाठ समयों में अठासी (८) सयोगी जिन प्राप्त होते हैं तो इक्यासी हजार छहसी बयासी मात्र सिद्धसमयों में कितने सयोगी जिन प्राप्त होंगे। इस प्रकार त्रैराशिक करने पर वही पूर्वोक्त ८९८५०२ सयोगी जिनों - ...--- १. धवल पु. पृ. ६२-६३ । २. बथल पु.३ पृ. ६६ | ३. धवल पू.३ पृ. ६४ |
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
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