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________________ ६.६२/गो. सा. जीवकाण्ड नगाथा ६३० की संख्या प्राप्त हो जाती है। इसी प्रकार अन्यत्र भी जानकर कथन करना चाहिए।' प्रमागाराणि फलरापिट इसहाराशि वन्यप्रमारण ८ समय २२ केवली ममय ३२६७२८ ८९८५०२ र समय ४४ केवली समय १६३३६४ | ९८५०२ ८ समय ८८ केवली । | समय ८१६८२ | ६५०२ ८ सभय । १७६ केवनी समय ४०८४१ ८१-५०२ उत्तर-मान्यता अनुसार सयोगी जिनों की संख्या--पाठ ममय अधिक छह महीनों के भीतर यदि पाठ सिद्धसमय प्राप्त होते हैं तो चार हजार सात सौ उनतीस बार पाठ समय अधिक छह माह में किनने सिद्धसमय प्राप्त होंगे? इस प्रकार त्रैगशिक करने पर सैंतीस हजार पाठसा बत्तीस मात्र सिद्धसमय प्राप्त होंगे। अब इस काल में संचित हए सयोगी जिनों का प्रमाण कहते हैं. बह इस प्रकार है...-पाठ समयों में से प्रत्येक समय में चौदह-चौदह सयोगी जिन होने हैं। गार ममयों के ४१४ =११२) एकसों बारह सयोगी जिन प्राप्त होते हैं तो संतीस हजार आठसा बत्तीस सिद्धसमयों में कितने सयोगी जिन प्राप्त होंगे? इस प्रकार वैगशिक करने पर पांच लाख उनतीस हजार छहसी अड़तालीस सयोगीजिन प्राप्त होते हैं।' पंचेव सयसहस्सा होंति सहस्सा तहेव उगतीसा । छरच सया अडयाला जोगिजिणाणं हदि संख्या॥५४॥ -सयोगी जिन जीवों की संख्या पाँच लाग्न उनतीस हजार छहमी अड़तालीस है। यह वाथन उत्तर मान्यता के अनुसार है। प्रमाया राशि फल गशि इच्छा गणि लब्ध ६ माह ८ समय ८ समय ४७२६ ३७८३२ रामय समय ११२ केवली ३७८३२ गमय | ५२९६४८ केवली ज्ञान, वेद, अवगाहना प्रादि की अपेक्षा एक समय में अपको की संख्या होति खवा इगिसमये बोहियबुद्धा य पुरिसवेदा य । उक्कस्से ठुत्तरसयप्पमा सग्गदो य चुदा ॥६३०॥ १. धवल पु.३ पृ. ६६-६७ । २. व ३. धवल पु. ३ पृ. १००।
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
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