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६.६/गो. सा. जीवकाण्ड
गाथा ६२४
समाधान-'मिथ्याष्टि जीव अनन्तानन्त हैं ।' इत्यादि रूप से प्रमाण का प्ररूपण करने से जाना जाता है कि प्रकृत में गणनानन्त से प्रयोजन है। इस गणनानन्त के अतिरिक्त शेष दस प्रकार के अनन्त प्रमाण का प्ररूपण करने वाले नहीं हैं, क्योंकि उनमें गणना रूप से कथन नहीं देखा जाता।
शंका-यदि प्रकृत में गणनानन्त से प्रयोजन है तो गणनानन्त के अतिरिक्त शेष दस प्रकार के अनन्तों का प्ररूपण यहाँ पर क्यों किया है ? समाधान - प्रवगणिवारणटुपयवस्स परूवरणा-रिणमित्तं च ।।
संसयविणासण? तच्चत्यवधारणा च ॥१२॥'
—अप्रकृत विषय का निवारण करने के लिए, प्रकृत विषय के प्ररूपगा करने के लिए, संशय का विनाश करने के लिए और तत्त्वार्थ का अवधारण करने के लिए यहाँ पर सभी अनन्तों का कथन किया गया है।
गरगनानन्त तीन प्रकार का है---परीतानन्त, युक्तानन्न और अनन्तानन्त । "मिश्या दृष्टि जीव अनन्तानन्त । अवसर्पिणियों और उत्सपिणियों के द्वारा अपहृत नहीं होते' इस मंत्र से जाना जाता है कि मिथ्यादृष्टि जीव अनन्तानन्त हैं ।
वह अनन्तानन्त भी तीन प्रकार का है- जघन्य अनन्तानन्त, उत्कृष्ट अनन्तानन्त. मध्यम अनन्तानन्त । 'जहाँ-जहाँ अनन्तानन्त देखा जाता है, वहाँ-वहाँ मध्यम अनन्तानन्त का ग्रहण होता है इस आर्ष वचन से जाना जाता है कि यहाँ पर मध्यम अनन्तानन्त का ग्रहण है।'
शंका वह मध्यम अनन्तानन्त भी अनन्त बिकल्प रूप है । यहाँ कौनसा विकरूप ग्रहण करने योग्य है ?
समाधान--जघन्य अनन्तानन्त से अनन्त बर्गस्थान ऊपर जाकर और उत्कृष्ट अनन्तानन्त से अनन्त वर्गस्थान नीचे आकर यथासम्भव राशि यहाँ पर अनन्तानन्त से ग्रहण करने योग्य है । अथवा जघन्य अनन्तानन्त के तीन बार वगित-संवगित करने पर जो राशि उत्पन्न हो उससे अनन्त गृणी और छह द्रव्यों के प्रक्षिप्त करने पर जो राशि उत्पन्न हो उससे अनन्त गुणी हीन मध्यम अनन्त प्रमाण मिथ्याष्टि जीवों की राशि है ।
सीनबार वगित-संगित राशि में सिद्ध, निगोद जीव, वनस्पति कायिक, पुद्गल, काल के रामय और अलोकाकाण ये छहों अनन्तानन्त मिला देने चाहिए ।५ प्रक्षिप्त करने योग्य इन छह राशियों के मिला देने पर 'छह द्रव्य प्रक्षिप्त राशि होती है। इस प्रकार तीन बार वर्गित सवर्गित राशि से अनन्तगुणे और छह द्रव्य प्रक्षिप्त राशि से अनन्तगुणे हीन इस मध्यम अनन्तानन्त की जितनी संख्या होती है, तन्मात्र मिथ्याष्टि जीवराशि है ।
१. धवल पु. ३ पृ.१७। २. धवल पु. ३ पृ. १८ । ३. धवल पु. ३ पृ. १६ । ४. धवल पु. ३ पृ. १६ । ५. "सिद्धा सिंणगोदजीवा वाफदी कालोय पोगाला चेय। मन्बमलोगागासं छप्पेदे णंतपक्मेवा ।।" ति. प. ४/३१२: "सिद्ध गियोद सहिय वाकदिपोग्गजपमा अणं नगुहा । काल अलोगागासं छच्चे देगांतपकदेवा ।।" त्रि. सा. गा, ४६ । ६. श्रवल पु. ३ पृ. २६ ।