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गाथा ६२४
सम्यक्त्वमागंगा//६०५
पढमादिकसाया सम्मत्तं देस-सयल-चारितं । जहाखाद घाति य गुणणामा होति सेसावि ॥४५॥
[गोम्मटसार कर्मकाण्ड] - प्रथम अनन्तानुवन्धी कपाय सम्यक्त्व का घात करती है, द्वितीय अप्रत्याख्यान कषाय देशचारित्र का, तृतीय प्रत्याख्यान कपाय सकलचारित्र का और चतुर्थ संज्वलन कषाय यथाख्यात चारित्र का घात करती है।
शङ्का अनन्तानुबन्धी कषाय चारित्रमोहनीय कर्म है तो वह किस चारित्र का घात करती है ?
समाधान.... अनन्तानुबन्धी कपाय-चतुष्क का चारित्र में व्यापार निष्फल भी नहीं है, क्योंकि अप्रत्याख्यान आदि के अनन्त उदय रूप प्रवाह के कारणभूत अनन्तानुबन्धी कषाय के निष्फलत्व का विरोध है।'
प्रथम बारह गुणस्थानों में जीव संख्या मिच्छा सावयसासरण-मिस्साविरदा दुधारणता य । पल्लासंखेज्जदिममसंखगरणं संखसंस्खगणं ॥६२४॥
गाथार्थ-मिथ्यादृष्टि जीव दुवार अनन्त अर्थात् अनन्तानन्त है। श्रावक (संयतासंयत जीव) पल्य के असंख्यातवें भाग हैं । उनसे प्रसंन्यात गुणे सासादन गुरगस्थान वाले जीव हैं। उनसे संख्यात गुणे मिश्र (सम्यत्रत्व मिथ्यात्व) गुणस्थान वाले जीव हैं, उनसे भी असंख्यात गुगणे असंयतसम्यग्दृष्टि जीव हैं ।। ६२४॥ विशेषार्थ -मिथ्यादष्टि जीत्र अनन्तानन्त हैं । अनन्त अनेक प्रकार का है
शाम ट्रयणा दवियं सस्सब मणणापदेसियमणंतं ।
एगो उभयावेसो विस्थारो सव्व भाशे य ॥६॥ ---नामानन्त, स्थापनानन्त, द्रव्यानन्त, शाश्वतानन्त, गणनानन्त, अनदेशिक अनन्त, एकानन्त, उभयानन्त, विस्तारानन्त, सर्वानन्त और भावानन्त इस प्रकार अनन्त के ग्यारह भेद हैं।
(इन ग्यारह प्रकार के अनन्तों का स्वरूप धवल पुस्तक ३ पृ. ११ से १६ तक देखना चाहिए) शंका-इन ग्यारह प्रकार के अनन्तों में से प्रकृति में क्रिस अनन्त से प्रयोजन है ? समाधान -प्रकृत में गणनामन्त से प्रयोजन है । शंका-यह कैसे जाना जाता है कि प्रकृत में गणनानन्त से प्रयोजन है ?
१. धवल पु ६ पृ. ४३ ।
२. घवल पु. ३ पृ. ११ ।
३. धवन पु. ३ पृ. १६ ।