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गाथा ६०१-६०३
सम्यक्त्वा / ६६६
विशेषार्थ - यह कथन गाथा ५६४- ५६५ के विशेषार्थ में किया जा चुका है।
नीचे की उत्कृष्ट वर्गला से ऊपर की जधन्य वर्गरणा का अन्तर कसं पुरण वहियं उवरिमं जहणं खु । इदि तेवीसवियप्पा पुग्गलदव्वा हु जिरणदिट्ठा || ६०१ ||
गाथार्थ - गुद्गल द्रव्य की तेईस वर्गणाओं में अपने से नीचे की उत्कृष्ट वर्गणा में एक अंक मिलाने से ऊपर की जघन्य वर्गणा का प्रमाण होता है। ऐसा जिन (श्रुतकेबली) ने कहा है ||६०१ ||
विशेषार्थ - देखो गाथा ४३४ ५०५ का विष
इन तेईस वर्गणाओं का विशेष कथन धवल पुस्तक १४ से देखना चाहिए । पुद्गल के छह भेद
पुढवी जलं च छाया चउरिदियविषयकम्मपरमाणू 1 छविवहभेयं भरियं पोग्गलदथ्यं जिरणवरेहिं ।। ६०२ ।। ' बादरबादर बादर बादरसुहमं च सुहमथूलं च । सुमं च सुमसुमं च घरावियं होदि छम्भेयं ॥। ६०३ ॥ २
गाथार्थ - १. पृथिवी, २. जल, ३ छाया, ४ चार इन्द्रियों का विषय, ५. कार्मरणवर्गणा और ६. परमाणु श्री जिनेन्द्र ने पुद्गलद्रव्य के ये छह भेद कहे हैं ||६०२ ।। १. बादरवादर २. बादर, ३. बादर सूक्ष्म, ४. सूक्ष्मबादर, ५. सूक्ष्म, ६. सूक्ष्म सूक्ष्म ये पृथिवी जल आदि की संज्ञा है ||६०३॥
विशेषार्थं जो छेदाभेदा जा सके तथा एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाया जा सके वह बादरबादर पुद्गल है जैसे काष्ठ, पाषाण, पृथिवी यादि । जो छेदन होने पर स्वयं नहीं जुड़ सकते वे बादरवादर हैं, जैसे भूमि, पर्वतादि । जो छेदाभेदा न जा सके किन्तु अन्यत्र से जाया जा सके वह बादर है जैसे जल | अथवा जो छेदे जाने पर तुरन्त स्वयमेव मिल जाये, वे बादर हैं, जैसे तेल, जल आदि । जो न छेदेभेदे जा सकें और न अन्यत्र ले जाये जा सकें वे वादर सूक्ष्म है जैसे छाया २७ अथवा जो हाथ से पकड़े नहीं जा सकते या हाथ द्वारा ग्रहण नहीं किये जा सकते श्रीर न देशान्तर को लेजाये जा सकते हैं; वे बादर-सूक्ष्म हैं, जैसे छाया, धूप आदि ।" चक्षुइन्द्रिय के अतिरिक्त अन्य चार इन्द्रियों का विषयभूत बाह्य पदार्थ सूक्ष्म स्थूल है ।" अथवा जो पुद्गल चक्षु इन्द्रिय का विषय तो नहीं है किन्तु शेष चार इन्द्रियों का विषय होता है वह सूक्ष्म बाबर है ।" कर्म सूक्ष्म है, जो देशावधि
परमावधि ज्ञान का विषय है वह सूक्ष्म है 119 ग्रथवा ज्ञानावरण आदि कर्मों के योग्य कारण वर सूक्ष्म हैं क्योंकि ये इन्द्रियाँ ज्ञान का विषय नहीं हैं । १२ परमाणु सूक्ष्मसूक्ष्म है, जो सर्वावधि ज्ञान का विषय है वह सब सुक्ष्म सूक्ष्म है । 13 कारणाओं से परे अर्थात् कार्मणवरणाओं से भी अत्यन्त सूक्ष्म दि श्रणुक स्कन्ध पर्यन्त सूक्ष्मसुक्ष्म है ।
१. धवल पु. ३ पृ. ३ जयबवल पु. १ पृ. २१५ वसुनन्दि श्रावकाचार गा. १८ : लघु ब्रव्य संग्रह गा. ७, पंचास्तिकाय गा. ७६ क स्व. का. पु. १३६ १ २. स्वा. का. प्र. पू. १३६ । ३. स्वा.का प्र. पू. १३६ । ४६.८.१०. १२. १४. पं. का. ग. ७६ की टीका ५. ७. ६. ११. १३. स्वा. का. म. गाथा २०६ की टीका ।