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________________ ६६८ नो. सा. जीवकाण्ड गाथा ५६६-६०० उत्कृष्ट सूक्ष्म निगोद द्रव्य वर्गणा में एक अंक मिलाने पर चौथी ध्र वशून्य वर्गरणा की सबसे जघन्य वर्गणा होती है । अनन्तर एक अधिक के क्रम से सब जीवों से अनन्त गुणे स्थान जाकर उत्कृष्ट ध्र वशुन्य द्रव्य वर्गणा होती है। यह जघन्य से उत्कृष्ट असंख्यातगुणो है । जगत्तर का असंख्यातवा भाग गुणाकार है, जो कि असंख्यात जगश्रेणी प्रमाण है । यह बाईसवी वर्गणा है ।२२।' उत्कृष्ट ध्र वशून्य द्रव्यबर्गरणा में एक अंक मिलाने पर सबसे जघन्य महास्कन्ध द्रव्यवर्गणा होती है। अनन्तर एक अधिक के क्रम से सब जीवों से अनन्तगुणे स्थान जाकर उत्कृष्ट महास्कन्ध द्रव्य वर्गणा होती है। यह जघन्य से उत्कृष्ट विशेष अधिक है। सबसे जघन्य महास्कान्य वर्गणा में पल्य के असंख्यातवें भाग का भाग देने पर जो लब्ध प्रावे उतना विशेष का प्रमाण है । यह तेईसवी वर्गणा है ।२३। जघन्य से उत्कृष्ट प्राप्त करने के लिए प्रतिगाग व गुणाकार प्रादि का कथन परमाणुवग्गणम्मि रण अवरुक्कस्सं च सेसगे अस्थि । गेज्झ महक्खंधाणं वरमहियं सेसगं गुरिणयं ॥५६६॥ सिद्धाणतिमभागो पडिभागो गेमगारण जेठं । पल्लासंखेज्जदियं अंतिमखंघस्सजेटुढें ॥५६७॥ संखेज्जासंखेज्जे गुणगारो सो दृ होदि हु अणते । चत्तारि अगेज्जेसु वि सिद्धारणमणंतिमो भागो ॥५६॥ जीवादोणंतगुणो धुवादितिष्ठं असंखभागो दु । पल्लस्स तदो तत्तो असंखलोगवहिदो मिच्छो ॥५६६।। सेढी सूई पल्ला जगपदरा संखभागगुरणगारा । अप्पप्परगप्रवरादो उक्कस्से होंति रिणयमेण ॥६००। गाथार्थ -परमाणु वर्गरणा में जघन्य व उत्कृष्ट का भेद नहीं है । शेष वर्गणाओं में जघन्य व उत्कृष्ट का भेद है ।। ५६६।। ग्रहण वर्गणाओं में उत्कृष्ट प्राप्त करने के लिए सिद्धों का अनन्तवा भाग प्रतिभाग है । अन्तिम महास्कन्ध में उत्कृष्ट प्राप्त करने के लिए पल्य का असंख्याता भाग प्रतिभाग है।।५६७।। संख्यात परमाणु द्रव्यबगंगणा में संन्यात गुणाकार है और असंख्यातप्रदेशी परमाण द्रव्यबर्गणा में गुणाकार असंख्यात है। अनन्त परमाणु द्रव्यवर्गणा में और चार अग्रहण-वर्गणाओं में सिद्धों या अनन्तवाँ भाग (अथवा अभव्यों से अनन्तगुरणा) गुरणाकार है ।।५६८।। ध्र ब अादि तीन वर्गणाओं में गुगाकार जीवराशि से अनन्तगुणा है। उससे आगे की वर्गणा में गुगाकार पल्य का असंख्यातवाँ भाग है । उससे पागे को वर्गगणा में गुणाकार असंन्यात लोक से भाजित मिथ्याष्टि जीवराशि है ।। ५६६।। उसमे आगे गुणाकार क्रम से श्रेणी का असंख्यातवां भाग, सूच्यंगुल का असंख्यातवा भाग, पत्य का असंख्यातर्वा भाग और जगत्प्रतर का असंख्यातवाँ भाग है। जघन्य को गुणावार से गुणा करने पर अपना-अपना उत्कृष्ट प्राप्त हो जाता है ।।६००|| १. धवल पु. १४ पृ. ११६-११३ । २. धवल पु. १४ पृ. ११७ ।
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
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