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________________ सम्यन्त्रमार्गगग / ६६७ उत्कृष्ट वशून्य द्रव्यवगंगा में एक अंक अर्थात् एकप्रदेश के मिलाने पर सबसे जघन्य बादर निगोद द्रव्यवगंगा होती है । वह क्षीणकषाय के अन्तिम समय में होती है। जो जीब क्षपित कर्माणिक विधि से आकर पूर्व कोटि की आयु वाले मनुष्यों में उत्पन्न हुआ, अनन्तर गर्भ से लेकर ग्राउ वर्ष और अन्तर्मुहूर्त का होने पर सम्यक्त्व और संयम को युगपत् ग्रहण करके पुनः कुछ कम पूर्व कोटि काल तक कर्मों की उत्कृष्ट गृशारगी निर्जरा करके सिद्ध होने के अन्तर्मुहूर्त काल अवशेष रहने पर उसने क्षपकश्रेणी पर आरोहण किया । अनन्तर क्षपकश्रेणी में सबसे उत्कृष्ट विशुद्धि के द्वारा कर्मनिर्जरा करके क्षीराकषाय हुए इस जीव के प्रथम समय में अनन्त बादर निगोद जीव मरते हैं । दूसरे समय में विशेष अधिक जीव मरते हैं। इसी प्रकार तीसरे यदि समयों में विशेष अधिक विशेष अधिक जीव मरते हैं । यह क्रम क्षीणकषाय के प्रथम से लेकर पृथक्त्वमावली काल तक चालू रहता है । इसके ग्रागे संख्यात भाग अधिक संख्यातभाग अधिक जोब मरते हैं । और यह क्रम क्षीणकषाय काल में प्रावली का संख्यातवाँ भाग काल शेष रहने तक चालू रहता है। इसके पश्चात् निरन्तर प्रति समय संख्यातगुणे जीव मरते हैं। इस प्रकार क्षीणकषाय के अन्तिम समय तक असंख्यात गुणे जीव मरते हैं । गुणाकार सर्वत्र पल्योपम का प्रसंख्याता भाग है ।' गाथा ५६४-५६५ यहाँ क्षीणकषाय के अन्तिम समय में जो प्रावली के असंख्यातवें भाग प्रमाण पुलवियाँ हैं, जो कि पृथक-पृथक प्रसंख्यात लोकप्रमाण निगोद शरीरों से अपूर्ण हैं उनमें स्थित अनन्तानन्त निगोद जीवों के जो अनन्त विस्रमोपचय से युक्त कर्म और नोकर्म संघात है, वह सबसे जघन्य बादर निगोद वर्गणा है। स्वयंभूरमण द्वीप की मुली के शरीर में उत्कृष्ट बावर निगोद वगंरणा होती है क्योंकि मूली के शरीर में एकबन्धनबद्ध जगच्छ्रेणी के असंख्यातवें भाग प्रमाण पुलवियाँ होती हैं। इस प्रकार यह उसीसवीं वर्गणा कही गई है | १६ | उत्कृष्ट बाद निगोद वर्गणा में एक अंक मिलाने पर तीसरी ध्रुवशुन्य वर्गणा की सबसे धन्य धन्य वर्गरणा होती हैं। पुनः इसके ऊपर प्रदेश अधिक के क्रम से सब जीवों से अनन्तगुणे स्थान जाकर तीसरी ध्रुवशून्य वर्गरणा की सबसे उत्कृष्ट वर्गणा होती है। अपनी जघन्य से उत्कृष्ट वर्गणा असंख्यातगुणी है। ग्रगुल के असंख्यातवें भाग प्रमाण गुणाकार है। यह बीसवीं वर्गणा है | २० | उत्कृष्ट ध्रुवशुन्य वर्गणा में एक अंक के मिलाने पर सूक्ष्म निगोद द्रव्यवर्गणा होती है । वह जल में, स्थल में और ग्राकाश में सर्वत्र दिखलाई देती है, क्योंकि बादर निगोद वर्गणा के समान इसका देश नियम नहीं है । यह सबसे जघन्य सूक्ष्म निगोद वर्गणा क्षपित कर्माशिक विधि से और क्षपित घोलमान विधि से आये हुए सूक्ष्म निगोद जीव के ही होती है, अन्य के नहीं, क्योंकि वहाँ जघन्य द्रव्य के होने में विरोध है । महामत्स्य के शरीर में एकबन्धनबद्ध छ जीवनिकायों के संघात में उत्कृष्ट सूक्ष्म निगोदवर्गणा दिखलाई देती है । जघन्य सूक्ष्म निगोदवर्गशा से लेकर उत्कृष्ट सूक्ष्म निगोदaणा पर्यन्त सब जीवों से अनन्तगुणे निरन्तर स्थान प्राप्त होकर एक ही स्पर्धक होता है, क्योंकि मध्य में कोई अन्तर नहीं है । जघन्य वर्गणा से उत्कृष्ट वर्गणा असंख्यात गुणी है। पत्य का असंख्यात भाग गुणाकार है | यह इक्कीसवीं वर्गरणा है | २१| २. धवल पु. १४ पृ. ६१ १. धवल पु. १४ पृ. ८५ 1 ३. धवल पु. १४ पृ. १११ । ४. घवलपु. १४ पृ. ११२-११३ । ५. धवल पु. १४ पृ. ११३-११४ । ६. धवल पु. १४ पृ. ११६ ।
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
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