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________________ ६७० / गो. सा. जीवकाण्ड स्वामिकार्तिकेयानुप्रेक्षा गा. २०६ की टोका में बादरबादर आदि ग्रह भेद पुद्गल की अपेक्षा से किये गये हैं इसलिए सूक्ष्मसूक्ष्म में परमाणु को भी ग्रहण कर लिया है किन्तु पंचास्तिकाय की टोका में बादरबादर आदि यह भेद कक्ष से किये गये हैं, इसलिए इन्होंने परमाणु को ग्रहण न करके स्कन्ध पर्यन्त ही सूक्ष्मसूक्ष्म का कथन किया है। क्योंकि परमाणु स्कन्ध नहीं है किन्तु सर्वावधि ज्ञान का विषय है। वह देशावधि या परभावधि ज्ञान का भी विषय नहीं है । अन्य प्रकार से पुद्गल के भेदों का कथन खंधं सयलसमत्थं तस्स य अद्ध भांति देसोति । श्रद्धद्ध च पदेसो प्रविभागो चेव गाथा ६०४ परमाणू ।।६०४।।' गाथार्थ - सकल व समस्त पुद्गलद्रव्य स्कन्ध है, उस स्कन्ध का श्राधा देश है। स्कन्ध के प्राये का आधा प्रदेश है । परमाणु प्रतिभागी है || ६०४ ।। विशेषार्थ - "सयलसमत्यं" भिन्न-भिन्न टीकाकारों ने इसके भिन्न-भिन्न अर्थ किये हैं, जो इस प्रकार हैं। मूलाचार की टीका में श्री वसुनन्दि श्राचार्य ने इसका अर्थ इस प्रकार किया है "सयल सह कलाभिर्वर्तते इति सकलं सभेदं परमाण्वन्तं । समत्थं समस्तं सर्वं पुद्गलद्रयं । सभेदं स्कन्धः सामान्य विशेषात्मकं पुद्गलदव्यमित्यर्थः ।" 'सयल' का अर्थ सकल न करके 'भेद सहित परमाणु पर्यन्त' यह अर्थ किया है। 'समत्थं' का अर्थ समस्त अर्थात् सर्व पुद्गल द्रव्य ऐसा किया है। इस प्रकार 'स्कन्ध' का अर्थ भेद सहित सामान्य विशेषात्मक पुद्गल द्रव्य किया गया है। इसी बात को वसुनन्दि-श्रावकाचार में इस प्रकार कहा है- "सयलं मुणेहि संधं ।" सकल पुद्गल द्रव्य को स्कन्ध कहते हैं। श्री वसुनन्दि आचार्य ने समस्त पुद्गल द्रव्य को स्कन्ध कहा है । श्री श्रमृतचन्द्राचार्य ने "अनन्तानन्तपरमाण्वारब्धोऽप्येकः स्कन्धो नाम पर्यायः ।" यह अर्थ किया है । अनन्तानन्त परमाणुओं से निर्मित होने पर भी जो एक हो वह स्कन्ध नाम को पर्याय है । कहा है श्री जयसेन श्राचार्य ने इस प्रकार अर्थ किया है- " समस्तोपि विवक्षितघटपटाघखण्डरूप: सकल इत्युच्यते तस्यानन्तपरमाणुपिण्डस्य स्कन्धसंज्ञा भवति । समस्त अर्थात् विवक्षित घट पट आदि अखण्ड रूप एक को सकल कहते हैं। उस अनन्त परमाणुत्रों के पिण्ड की स्कन्ध संज्ञा है । श्री शुभचन्द्राचार्य ने स्वामिकार्तिकेयानुप्रेक्षा गाथा २०६ व २७२ की टीका में इस प्रकार "स्कन्धं सर्वांशसम्पूर्ण भान्ति ।" जो सर्वांशसम्पूर्ण हो वह स्कन्ध है । श्री वसुनन्दि प्राचार्य ने स्कन्ध में समस्त पुद्गलद्रव्य को ग्रहण किया है किन्तु अन्य प्राचार्यों ने घट पट यदि एक अखण्ड पुद्गल पर्याय को स्कन्ध कहा है, क्योंकि वह सर्वाशसम्पूर्ण है। स्कन्ध १. पंचास्तिकाय गा. ७५ किन्तु 'य' के स्थान पर 'दु है। मूलाचार ५३३४ किन्तु 'परमाणू चेय श्रविभागी राट हैं, स्वा. का. प्र. गा. ९०६ टीका, वि. प. ११६५ ॥ २. पं. का. गा. ७५ समय व्याख्या टोका। ३. प. का. ग्रा. ७५ तात्पयं वृत्ति टीका |
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
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