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गाथा ५७४-५७७
सम्यक्त्वमार्गमा/६४३
मुहूर्त होता है। इसी प्रकार शेष दिवस, पक्ष, मास, ऋतु, अयन, वर्ष प्रादि को जानना चाहिए । संपात असंख्यात व प्रनन्त प्रावलियों का व्यवहार काल होता है ॥५७५-५७६।। ज्योतिषी देवों का संचार मानुष क्षेत्र में ही होता है अत: उसी के समान व्यवहार काल जानना चाहिए ।।५७७।।
विशेषार्थ जघन्य-युक्तासंख्यात प्रमाग समयों की एक प्रावली होती है।' समय का कथन गाथा ५७३ में किया जा चुका है।
शंका- जघन्य-युक्तासंस्थात का क्या प्रमारग है ?
समाधान—एक अधिक उत्कृष्ट परीतासंख्यात जघन्य युक्तासंख्यात का प्रमाण है। अथवा जघन्य परीतासंख्यात का विरलन कर प्रत्येक एक अंक पर उसो जघन्यपरीतासंस्थात को देय देकर परस्पर गुमा दो से जमन्या पुस्ता संसपास होता है जो प्रावली सदृश है। इस प्रमाण में से एक कम कर देने पर उत्कृष्ट परीतासंख्यात प्राप्त होता है।
अदरपरितं विरलिय तमेव दाबूरण संगुणिदे ॥ ३६ ॥ प्रवरं जुत्तमसंखं प्रावलिसरिसं तमेव रुजणं ।
परिमिद बरमावलिकिवि दुगवावर विरूव जुत्तवरं ।। ३७ ॥ शंका -जघन्यपरीतासंख्यात का प्रमाण किस प्रकार प्राप्त किया जाय ?
समाधान-इस सम्बन्ध में त्रिलोकसार ग्रन्थ में गाथा १४-१५ और २६ से ३५ गाथा में इस प्रकार कहा गया है
-संख्यात का ज्ञान करने के लिए ग्रनवस्था, शलाका, प्रतिशलाका और महाशलाका ऐसे चार कुण्डों की कल्पना करनी चाहिए। प्रत्येक कुण्ड का व्यास एक लाख योजन और उत्सेध एक हजार योजन है। द्वि प्रादि संख्यात सरसों से अनवस्था कुण्ड को भरना चाहिए। एक बार अनवस्था कुण्ड भर जाय तब एक सरसों शलाकाकुण्ड में डालना चाहिए। तथा अनवस्था कुण्ड के जितने सरसों हैं, उन्हें बुद्धि द्वारा या देव द्वारा ग्रहण कर प्रत्येक एक-एक द्वीप-समुद्र में एक-एक दाना डालते हुए जिस द्वीप या समुद्र पर दाने समाप्त हो जायें, बहाँ से लेकर नीचे के अर्थात् जम्बुद्वीप पर्यन्त पहले के सभी द्वीप-समुद्रों के प्रमाण बराबर दूसरा अनवस्था कुण्ड बनाकर सरसों से भरना चाहिए । दुसरे अनवस्था कुण्ड के लिए प्रथम कुण्ड के सरसों गच्छ हैं। तीसरे अनवस्था कुण्ड के लिए प्रथम और द्वितीय अनवस्था कुण्ड के सरसों गच्छ हैं। इसी प्रकार जो पूर्व-पूर्व के गच्छ हैं, उन-उन के द्वारा उतरोत्तर अनवस्था कुण्डों की सरसों का प्रमाण साधा जाता है। दूसरे अनवस्था कुण्ड को पूर्ण भरकर पुनः एक दुसरी शलाका स्वरूप सरसों शलाका कुण्ड में डालना चाहिए। इसी क्रम से बढ़ते हुए जव शलाका कुण्ड भर जाय तब एक दाना प्रतिशलाका कुण्ड में डालना और शलाकाकुण्ड को खाली करके पूर्वोक्त प्रकार हो पुनः उसे भरकर प्रतिश नाका कुण्ड में दूसरा दाना डालना चाहिए ।
१. "जपन्ययुक्तासंख्यातसमयराशिः पावलिः स्यात् ।" (स्वा. का, अ. मा. २२० टोका); "प्रबरं जुत्तमम आवलिसरिस" (त्रि. सा. गा. ३७)। २. पिलोकसार ।