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६४२ / गो. सा. जीवकाण्ड
गाथा ५७४- ५७७
शङ्का - ग्राकाश तो अखण्ड द्रव्य है उसमें प्रदेश का कथन उचित नहीं है ?
समाधान- यद्यपि आकाश अखण्ड द्रव्य है तथापि धर्मद्रव्य तथा अधर्मद्रव्य के कारण लोकाकाश, अलोकाकाश ऐसे दो खण्ड श्रनादि काल से हैं । लोकाकाश के भी मनुष्य लोक, तिर्यग्लोक, नरक लोक, स्वर्गं लोक आदि खण्ड पाये जाते हैं। जितने श्राकाश एक पुद्गल परमाणु प्राजाय
वह प्रदेश है । '
शंका- जितने काल में आकाश के एक प्रदेश से दूसरे प्रदेश में परमाणु गमन करता है उनने काल का नाम संयम है तो परमाणु के चौदह राजू गमन करने पर जितने चौदह राजू आकाश के प्रदेश हैं उतने समय लगने चाहिए, एक समय में चौदह राजू गमन कैसे सम्भव है ?
समाधान - परमाणु एक समय में एक आकाशप्रदेश से दूसरे साथवाले प्रदेश पर गमन करता है । उसको यथायोग्य मन्द गति से गमन करने में एक समय लगता है । यदि परमाणु शीघ्र (तीव्र) गति से गमन करे तो एक समय में चौदह राजू गमन कर सकता है। इसमें दृष्टान्त यह है कि जैसे देवदत्त नामक पुरुष धीमी चाल से सौ योजन सौ दिन में जाता है, वही देवदत्त विद्या के प्रभाव से शीघ्र गति के द्वारा सौ योजन एक दिन में भी जाता है । मन्द गति व शोध गति की अपेक्षा एक समय में एक प्रदेश व चौदह राज गमन में कोई बाधा नहीं आती।
श्रावलि संखसमया संखेज्जावलिसमूहमुस्सासो ।
सत्तुमासा थोबो सत्तत्थोया लवो भरियो ।। ५७४ | ३ अत्तीसद्धलवा नाली बेनालिया मुहुत्तं तु । एगसमयेण होणं भिण्णमुहतं तदो सेसं ।। ५७५ ॥ * farst पक्खो मासो उडु प्रयणं घस्समेवमादी हु 1 संखेज्जासंखेज्जारांताओ होदि यवहारो ।।५७६ ।। * यवहारो पुण काली माणुसखेत्तम्हि जाणिदधो दु । जोइसियाणं चारे यवहारो खलु समालोत्ति ।। ५७७ ॥ *
गाथार्थ - प्रसंख्यात समय की एक आवली होती है । संख्यात ग्रावली का एक उच्छ्वास
( नाड़ी), सात उच्छ्वास का एक स्तोक, सात स्तोक का एक लब होता है || १७४।। साढ़े अड़तीस लबों की एक नाली (घड़ी), दो घड़ी का एक मुहूर्त होता है। एक समय कम मुहूर्त भिन्न
सृ गयखदव्वं च तं च पदे भरण प्रवरावरकारणं जस्स ।। " जितने भाग आजाय उतने क्षेत्र को प्रदेश कहते है । इस प्रदेश के निर्मित ने दूर व का. प्र. ग. २२० की टीका ! | २. बृहद्रव्य संग्रह गा. २२ की टीका । स्वामिकार्तिकेयानुप्रेक्षा गा. २२० को टीका । ६ स्वामिकार्तिकेयानुप्रेक्षा
१. "जेसीविखेत्तमेतं अशा रुद्ध आकाश में पुद्गल का एक निकट का व्यवहार होता है | स्वा. २.४.५. धवल पु. ३. ६६ गा. २२१ की टीका ।