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________________ गाथा ५.५२-५७३ सम्यक्त्वमागंगा/६४१ समाधान – जैसे चाक के एक भाग में डंडे की प्रेरणा से सर्व चाक धूमने लगता है, वैसे ही प्राकाश अखण्ड द्रव्य होने से आकाश के एक भाग लोकाकाश में स्थित काल द्रव्य के कारण समस्त प्राकाश में परिणमन होने से कोई वाधा नहीं आती है।' व्यवहार काल यवहारो य वियप्पो भेदो तह पज्जनोत्ति एयहो । ववहारप्रवद्वारगटिदी हु ववहारकालो दु ॥५७२॥ प्रवरा पज्जायठिदी खरणमेत्तं होदि तं च समप्रोत्ति । दोण्हमणूणमदिक्कमकालपमाणं हवे सो दु ।।५७३।। गाथार्थ-व्यवहार, विकल्प, भेद, पर्याय, ये एकार्थवाची शब्द हैं । व्यवहार का अवस्थान या स्थिति वह व्यवहार काल है ।। ५.७२॥ जघन्य पर्याय स्थिति क्षमा मात्र होती है, वही समय है। दो परमाणुओं के अतिक्रमकाल प्रमाण समय है ।।५७३३॥ विशेषार्थ-जो व्यवहार के योग्य हो वह व्यवहार है। व्यवहार, विकल्प, भेद और पर्याय इन शाब्दों का एक ही अर्थ है। भेद से कथन करना या पर्याय की अपेक्षा कथन करना यह सब व्यवहार नय का विषय है । व्यवहार अर्थात् पर्याय का जो अवस्थान अर्थात् स्थिति वह व्यवहार काल है, क्योंकि जो स्थिति है वह काल संज्ञक है। जैसे नाड़ी की जो स्थिति है वह उच्छ्वास नामक व्यवहार काल है । द्रव्यों की जघन्य पर्याय-स्थिति क्षण मात्र होती है और जघन्य स्थितिम क्षण मात्र को ही समय कहते हैं । गमनपरिगत दो परमारणों का परस्पर-अतिक्रम काल प्रमाण ही समय रूप वयवहार काल होता है। एक परमाण का दूसरे परमाणु को व्यतिक्रम करने में जितना काल लगता है, उस काल को समय कहते हैं ।६।। तत्त्रायोग्य वेग से एक परमाणु के ऊपर की ओर और दूसरे परमाणु के नीचे की ओर जाने वाले इन दो परमाणुनों के शरीर द्वारा स्पर्शन होने में लगने वाला काल समय कहलाता है।" गभएयपसत्थो परमाणु-मंदगइपवट्ट तो। वीयमरांतरखेतंजावदियं जादि तं समयकालो।। [स्वा. का. प्र. मा. २२० टीका] - अाकाश के एक प्रदेश पर स्थित एक परमाणु योग्य मन्द गति के द्वारा गमन करके दूसरे अनन्तर प्रदेश पर जितने काल में प्राप्त हो, उतने काल को एक समय कहते हैं । १. वृहद्भ्यसंग्रह गा. २२ की टीका । २. म्वा. का. प्र. गा. २२० की टोका। ३. "व्यवहुनु योग्यो व्यवहार: विकल्प: भेद: पर्याय इत्येकार्थः ।।" [स्वा. का. न. गा. २२० टीका] । ४. "स्थितिः कास्नसंज्ञका" हिद द्रव्य संग्रह गा. २१ टीका]। ५. स्वा. का. प्र. गा. २२० टीका। ६. "मणोरण्वंतर व्यतिक्रमकाल: समयः ।" [धवल पु. ४ पृ. ३१८] । ७. "दोगं परमाणूणं सप्पासोग्गवेगेश उडमधो न गल्छताणं सरीरेहि मगोसाफोसणकालो समग्रो गाम ।" [धवल पु. १३ पृ. २६८] ।
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
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