________________
६४० / गो. सा. जीवकाण्ड
३
। इस प्रकार
हैं।" और क्षण से प्रयोजन समय से है। शुद्ध नय से अभिप्राय सूक्ष्म ऋजुसूत्र नय से ऋजुसूत्र तय की अपेक्षा अपनी स्थिति समय साथ होती है। इसकी उत्पत्ति कालद्रव्य के आश्रय से होती है ।
-
गाथा ५७० ५७१
सत्ता रूप स्वभाव वाले जीव के तथैव पुद्गलों के और च शब्द से धर्मं द्रव्य अधर्म द्रव्य और आकाश द्रव्य के परिवर्तन में जो निमित्त कारण हो, वह नियम से काल द्रव्य है ।
शंका- कालद्रव्य के परिणमन में कौन सहकारी कारण है ?
समाधान- काल द्रव्य अपने परिणमन में स्वयं सहकारी कारण है। जिस प्रकार ग्राकाश द्रव्य शेष सत्र द्रव्यों का आधार है और अपना आधार भी श्राप है, इसी प्रकार काल द्रव्य भी अन्य सब द्रव्यों के परिणमन में सहकारी कारण है और अपने परिणमन में भी सहकारी कारण है। * अथवा जैसे दीपक घट पट आदि अन्य पदार्थों का प्रकाशक होने पर भी स्वयं अपने आपका प्रकाशक होता है, उसे प्रकाशित करने के लिए अन्य दीपक यादि की आवश्यकता नहीं हुआ करती, इसी प्रकार से काल द्रव्य भी अन्य जीव पुद्गल आदि द्रव्यों के परिवर्तन का निमित्त कारण होते हुए भी अपने आपका परिवर्तन स्वयं ही करता है, उसके लिए किसी अन्य द्रव्य की प्रावश्कता नहीं पड़तो [घवल पु. ४ पृ. ३२० - ३२१ ] ।
सम्भावसभावाणं जीवाणं तह य पोगालाणं च । परियट्टसंभूयो कालो पियमेस पण्णत्तो ||२३|| [ पंचास्तिकाय ]
शंका- जैसे काल द्रव्य अपना उपादान कारण है और अपने परिणमन का सहकारी कारण है, वैसे ही जीव यादि सब द्रव्य भी अपने उपादान कारण और अपने-अपने परिणमन के सहकारी कारण क्यों नहीं हैं ? उनके परिगमन में काल क्या प्रयोजन ?
शंका सकता है ?
समाधान - ऐसा नहीं है, यदि अपने से भिन्न बहिरंग सहकारी कारण की आवश्यकता न हो तो सब द्रव्यों के साधारण गति, स्थिति, श्रवगाहन के लिए सहकारी कारणभूत धर्म अधर्म व आकाश द्रव्य की भी कोई आवश्यकता नहीं रहेगी । काल का कार्य घड़ी, दिन यादि प्रत्यक्ष दिखाई देते हैं, किन्तु धर्म द्रव्य श्रादि का कार्य तो केवल श्रागम से ही जाना जाता है। यदि काल द्रव्य का प्रभाव माना जाएगा तो धर्म द्रव्य, अधर्म द्रव्य व आकाश द्रव्य के प्रभाव का प्रसंग भी उसी प्रकार बाजाएगा और तब जीव तथा पुद्गल ये दो ही द्रव्य रह जायेंगे, जो श्रागमविरुद्ध है ।
लोकाकाश में काल द्रव्य का प्रभाव होने से अलोकाकाण में परिणमन कैसे हो
१. कसमवति पर्यायाभयंते ।" [ पंचास्तिकाय गा. १६ तात्पर्यवृति टीका ] । २. वामेतं तं च समश्रोति।" | गो. जी. गा. ५७३] । ३. "तच वर्तमान समयमात्रं तद्विषयपयममा ग्राह्यमृजुमूत्र” [स.सि. १३३ । । ४. "कालद्रव्यं परेषां द्रव्याणां परिणतिषयत्वेन महकारीकार स्वस्थाषि । " | स्वामि कार्तिकेयानुप्रेक्षा या. २१० टीका ] । ५. ६. बृहद्रव्यसंग्रह गाथा २२ को टीका ।