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________________ ३४/गो. सा. जीवकाण्ड गाथा ३२-३१ शा--दर्शनमोहनीय कर्म के उपशम, क्षय और क्षयोपशम का प्राधय करके संयतासंयत के औपशामिकादि तीन भावों का कथन भी होना चाहिये था सो क्यों नहीं किया गया ? समाधान--नहीं, क्योंकि दर्शनमोहनीय कर्म के उपशमादिक से संबमासंयम की उत्पत्ति नहीं होती । छठे- प्रमत्तगुणस्थान का लक्षण संजलगणोकसायाणुदयावो संजमो हवे जम्हा । मलजणरएपमादो वि य तम्हा हु पमत्तविरदो सो ॥३२॥ रेवत्तावत्तपमादे जो असइ पमत्तसंजदो होइ । सयल-गुण-सील-कलिलो महम्बई चित्तलायरणो ॥३३॥ पन्द्रह प्रमाद अविकहा तहा कसाया इंदियरिणद्दा तहेव परणयो य । च-च-परगमेगेगं होति पमादा हु पाणरसा ॥३४॥ गाथार्थ - मज्वलन और नोकषाय के उदय से संयम होता है, इस संयम के साथ मल को उत्पन्न करने वाला प्रमाद भी है, अतः वह प्रमनविरत है ।।३३।। जो सकल गुरग-शोल से युक्त है, अतएव महाव्रती है, व्यक्त और अव्यक्त प्रमाद में वास करता है अतएव चित्रल आचरणी है, वह प्रमत्तसंयत है ।।३३।। चार विकथा. चार कषाय, पाँच इन्द्रियाँ, एक निद्रा और एक प्रणय (स्नेह) ये पन्द्रह प्रमाद हैं ।।३४।। विशेषार्थ-प्रकर्ष से मत्त जीव प्रमत्त है। भले प्रकार विरत या संयम को प्राप्त जीव संयत है। जो प्रमाद सहित होते हुए भी संयत है वह प्रमत्तसंयत है ।। शङ्का-यदि प्रमत्त है तो संयत नहीं हो सकता, क्योंकि प्रमत्त जीव को अपने स्वरूप का संवेदन नहीं हो सकता । जो संयत है, वह प्रमत्त नहीं हो सकता, क्योंकि संयमभाव प्रमाद के परिहार-स्वरूप होता है। __समाधान- यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि हिंसा, असत्य, स्तेय, प्रब्रह्म और परिग्रह इन पांच पापों से विरतिभाव संयम है जो कि तीन गुप्ति और पांच समितियों से अनुरक्षित है। वह संयम वास्तव में प्रमाद से नष्ट नहीं किया जा सकता है, क्योंकि प्रमाद से संयम में केवल मल की ही उत्पत्ति होती है। शडा- यहाँ पर संयम में मल उत्पन्न करने वाला प्रमाद ही विवक्षित है, संयम का नाश करने वाला प्रमाद नहीं है यह कैसे निश्चय किया जाय? - - - -- १. घ. पु. ५ पृ. २०३ । २. घ. पु. १ पृ. १७८, प्रा. पं. स. प. १ गाथा १४ । ३. प. पु. १ पृ. १७८, प्रा. पं. सं.अ. १ गा. १५। ४. प. पु. १ पृ. १७५ ।
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
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