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________________ गाथा ५४३,५४५ लेण्यामार्गरणा/६७ करके उत्कर्षतः शरीर से तिगुणे प्रमाण जीवप्रदेशों के काण्ड, एक खम्भ स्थित तोरण, हल व गोमूत्र के प्रकार से अन्त मुहूर्त तक रहने को मारणान्तिक समुद्घात कहते हैं ।' तैजस्क शरीर के विसर्पण का नाम तेजस्क शरीर समुद्घात है। बह दो प्रकार का होता है--निस्सरसारमन और अनिस्सरणास्मक । उनमें जो निस्सरणात्मक तेजस्कशरीर विसरण है वह प्रशस्त और अप्रशस्त के भेद से दो प्रकार का है। उनमें अप्रशस्त निस्सरणात्मक तेजस्कशरीर समुद्घात बारह योजन लम्बा, नौ योजन विस्तार बाला सूच्यंगुल के संख्यालवें भाग मोटाई वाला, जपाकुसुम के सदृश लालवर्णवाला, भूमि और पर्वतादि के जलाने में समर्थ, प्रतिपक्ष रहित, रोष रूप ईधनवाला, बायें कन्धे से उत्पन्न होने वाला और इच्छित क्षेत्र प्रमाण विसर्पगा करने वाला होता है। तथा जो प्रशस्त निस्सरणात्मक तेजस शरीर समुद्घात है, वह भी विस्तारादि में तो अप्रशस्त तेजग के समान है, किन्तु इतनी विशेषता है कि वह हंस के समान धवल वर्णवाला, दाहिने कन्धे से उत्पन्न होकर प्राणियों की अनुकम्पा के निमित्त से उत्पन्न होकर राष्ट्रविप्लव, मारी, रोग आदि के प्रशमन करने में समर्थ होता है। अनिस्सरणात्मक तेजस शरीर समूदधात का यहाँ अधिकार नहीं है।' जिनको ऋद्धि प्राप्त हुई है, ऐसे महषि के आहारक समुद्घात होता है। इसका विस्तार पुर्वक कथन गाथा २३५-२३६ में किया जा चुका है। दण्ड, कपाट. प्रतर और लोकपूरण के भेद से केवली समुद्घात चार प्रकार का है। उनमें जिसकी अपने विष्कम्भ से तिगुनी परिधि है ऐसे पूर्व शरीर के बाहृल्यरूप अथवा पूर्वशरीर से तिगुने बाहल्य रुप दण्डाकार से केवली के जीवप्रदेशों का ऋछ कम चौदह गज फैलने का नाम दण्डसमदरात है । दण्डसमुद्घात में कहे गये बाइल्य और आयाम के द्वारा वात वलय से रहित सम्पूर्ण क्षेत्र के व्याप्त करने का नाम कपाटसमुद्घात है । बातवलय अविरुद्ध क्षेत्र के अतिरिक्त सम्पूर्ण लोक में व्याप्त होकर केवली भगवान के जीवप्रदेशों का फैलना प्रतर समुद्घात है। धनलोक प्रमाण केवली भगवान के जीव प्रदेशों का सर्वलोक को व्याप्त करने का नाम लोकपूरण समुद्घात है। प्रागे गाथा ६६८ में समुद्घात का लक्षरण नाहा जाएगा, अतः यहाँ पर उसका कथन नहीं किया गया। उपपाद दो प्रकार है-- ऋजुगतिपूर्वक और विग्रहगतिपूर्वक्र । इनमें प्रत्येक मारणान्तिकसमुद्रात पूर्वक और तद्विपरीत के भेद से दो प्रकार है ।५ उपपाद उत्पन्न होने के पहले समय में ही होता है। ऋजुगति से उत्पन्न हुए जीवों का क्षेत्र अहुरा नहीं पाया जाता है, क्योंकि इसमें जीवों के समस्त प्रदेशों का संकोच हो जाता है । विग्रह तीन प्रकार का है-पाणिमुक्ता, लांगलिका और गोमूत्रिक । इनमें से पारिगमुक्ता गति एक विग्रह बाली होती है। विग्रह, वक्र और कुटिल ये सब एकार्थवाची हैं। लांगलिका गति दो विग्रहवाली होती है और गोमूत्रिका गति तीन विग्रहवाली होती है। इनमें मारणान्तिक समुद्घात के बिना विग्रहगति से उत्पन्न हए जीवों के और ऋजगति से उत्पन्न जोवों के प्रथम समय में होने वाली अवगाहनाएँ समान ही होती हैं। विशेषता केवल इतनी १. धवल पु. ४ पृ. २७ व पु. ७ पृ. ३००। ४. धवल पु. ४ पृ.२८-२६। ५. धवल पृ. २. धवल पु. ४ पृ. २३-२। पृ.३०० । ३. घनल पु. ४ पृ. २ ।
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
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