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________________ ६०६/गो. सा. जीवकाण्ड गायों १४३,५४५ घरपो घेतन्यो ।" यहाँ सात राजुओं का धनात्मक लोक ग्रहण करना चाहिए ।' अन्य प्राचार्यों के द्वारा प्ररूपित मृदंगाकार लोक को ग्रहण नहीं करना चाहिए, क्योंकि उसका घनफल १६४ १ राजू होता है, जो सात राजुओं के धनात्मक {७४७४७) ३४३ घन राजू के संख्यातवें भाग है। सात गज के घनात्मक लोक के सिवा अन्य कोई क्षेत्र नहीं है जिसे 'लोक संज 'लोक संज्ञा दी जा सके। शङ्का- असंख्यातप्रदेशी लोक में पसंख्यात प्रदेशी अनन्त जीव, उनसे भी अनन्त मुरणे पुद्गल लोकाकाशप्रमाण असंख्यात कालाण, लोकाकाशप्रमाण धर्म द्रव्य तथा अधर्म द्रव्य कैसे रहते हैं ? समाधान--एक दीपक के प्रकाश में अनेक दीपकों का प्रकाश समा जाता है, अथवा एक गूढ़ रस विशेष से भरे सीसे के बर्तन में बहुत सा सुवर्ण समा जाता है, अथवा भस्म से भरे हुए घट में सुई और ऊँटनी का दूध आदि समा जाते हैं, इत्यादि दृष्टान्तों के अनुसार विशिष्ट अवगाहना शक्ति के कारण असंख्यात प्रदेश वाले लोक में पूर्वोक्त जीव, पुद्गल प्रादि के भी समा जाने में विरोध नहीं पाता। क्षेत्र व स्पर्शन का कथन स्वस्थान, समृद्घात और उपपाद की अपेक्षा तीन प्रकार का है। उनमें स्वस्थान दो प्रकार का है- स्वरथान स्वस्थान और बिहार वस्वस्थान । उनमें से अपने उत्पन्न होने के ग्राम में, नगर में अथवा अरण्य में सोना, बैठना, चलना प्रादि व्यापार से युक्त होकर रहने का नाम स्वस्थानस्वस्थान है। अपने उत्पन्न होने के ग्राम, नगर अथवा अरण्य प्रादि को छोड़कर अन्यत्र शयन, निषीदन (अर्थात् बैठना) और परिभ्रमण श्रादि व्यापार से युक्त होकर रहने का नाम विहारवत्स्वस्थान है । समुद्यात सात प्रकार का है—१. वेदना समुद्घारा, २. कषाय समुद्घात, ३. वैऋियिक समुद्घात, ४. मारणान्तिक समुद्घात, ५. तेजस्क शरीर समुद्घात ६. आहारकार समुद्घात और ७. केवली समुद्घात । उनमें से नेत्रवेदना, शिरोवेदना आदि के द्वारा अपने शरीर के बाहर एक प्रदेश को ग्रादि करके उत्कर्षतः जीवप्रदेशों के विष्कम्भ और उत्सेध की अपेक्षा तिगणे प्रमाण में फैलने का नाम वेदना समुद्घात है ।। उत्सेध की अपेक्षा और विषकम्भ की अपेक्षा तिगुरगा फैलने से अबगाहना (३४३) नौ गुणी हो जाती है। क्रोध, भय ग्रादि कषाय की तीव्रता से जीवप्रदेशों का ति गुणे प्रमाण फैलना कषाय समुद्घात है। इसमें भी अवगाहना ६ गुणी हो जाती है ।' विविध ऋद्धियों के माहात्म्य से अथवा बंक्रियिक शरीर के उदयबाले देव व नारकी जीवों का संख्यात व असंख्यात योजनों को शरीर से व्याप्त करके अथवा अपने स्वभाविक आकार को छोड़कर अन्य प्राकार से जीदप्रदेशों के अबस्थान का नाम वैक्रियिक समुद्घात है। अपने वर्तमान शरीर को नहीं छोड़कर पायाम की अपेक्षा अधिष्ठित प्रदेश से लेकर उत्पन्न होने के क्षेत्र तक, तथा बाहल्य से एक प्रदेश को प्रादि १. अन्नल पु. ४ पृ. ७-८-६-१०। २. श्रवल . ४ पृ. ११-१८ । ३. "ण च एदवादिरित्तमण्णं सतरज्जुघण पमाणं लोगसगिदं खेत्तमस्थि ।" [धकर ३४ पृ. १८]। ४. वृहद द्रव्य संग्रह गाथा २० की टीका। ५. प. पु. ४ पृ. २६ ; गो. जी गा. ६६७ । ६. धवल पु. ४ पृ. २६, पु. ३ पृ. २६६; पु. ११ पृ. १८ । ७. घवल पु. ७ पृ. ३०१, पु. ४ पृ. ६३ ५ ८. घवल पु. ४ पृ. २६. पु. ७ पृ. २६६ । ६. धवल पु. ४ पृ. ६३, पु.७ पृ. ३०१ । १५. धवल पु. ४ पृ. २६, पु. ७ पृ. २६६ ।
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
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