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________________ गाथा ५३१-५४२ लेश्यामार्गरणा/६७३ असंख्यातवें भाग मात्र होते हैं । वाणव्यन्तर देव भी पर्याप्त काल में तेजोलेश्या से युक्त होते हैं । वे वाणव्यन्तर पर्याप्त जीव ज्योतिषियों के पासवें भावान होगे हैं । इन्ही पाणथ्यन्तरों में अपर्याप्त जीव कृष्ण नील और कापोत लेण्या से युक्त होते हैं। और वे अपर्याप्त वारणव्यन्तर देव अपनी पर्याप्त राशि के संख्यातवें भाग प्रमाण होते हैं। मनुष्य और तिर्यंचों में भी तेजोलश्या से युक्त जीव जगत्प्रतर के असंख्यातवें भाग प्रमाण हैं, जो पद्म लेण्या से युक्त तिर्यंचराशि से संख्यात गुणी है। इन तीनों राशियों को भवनवासी और सौधर्म-ऐशान राशि के साथ एकत्र कर देने पर यह राशि ज्योतिषी देवों से कुछ अधिक हो जाती है ।' शङ्का-भवनवासी देवों का कितना प्रमाण है ? समाधान-भवनवासी देव असंख्यात जगश्रेणी प्रमार हैं ।।३७।। ये प्रसंख्यात जगश्रेणियाँ जगत्प्रतर के असंख्यातवें भाग प्रमाण हैं ॥३८॥ उन असंख्यात जगश्रेणियों की विष्कम्भ सूची सूच्यंगुल को सूच्यंगुल के वर्गमूल से गुरिणत करने पर जो लब्ध हो, उतनी है ।।३६।। अर्थात् सूच्यंगुल x मूच्र्यगुल का बर्गमूल x जगधेणी-घनागुल का वर्गमूल गुरिंगत जगश्रेणी । इतने भवनवासी देव हैं। शा-वानव्यन्तर देवों का कितना प्रमाण है ? समाधान -वामन्यन्तर देवों का प्रमाण जगत्प्रतर के संस्यात सौ योजन के वर्ग रूप प्रतिभाग से प्राप्त होता है ।।४३।। सूत्र में 'संख्यात सौ योजन' ऐसा कहने पर तीन सौ योजनों के अंगुल करके वगित करने पर पांच सौ तीस कोड़ाकोड़ी, चीरासी लाख सोलह हजार कोडी (५३०८४१६००००००००००) है। अर्थात् तीन सौ योजन के अंगुल का वर्ग करके जगत्प्रतर में भाग देने से जो लब्ध प्राप्त हो उतने वानव्यन्त र देव हैं। शङ्का-मोधर्म-ऐशान देव कितने हैं ? समाधान -सौधर्म-ऐशान देव असंख्यात जगधेगी प्रमाण हैं ।।४८।। ये असंख्यात जगणियाँ जगत्पतर के असह्यातवें भाग प्रमागा हैं ।।४६।। उन असंख्यात जगश्रेणी की विष्कम्भ सूची सूच्यंगुल के तृतीय वर्गमूल से गुरिणत सूच्यं पुल के द्वितीय वर्गमूल प्रमाण है ।।५०।। धनांगुल के तृतीय वर्गमूल मात्र जगश्रेणी प्रमाण सौधर्म-ऐशान कल्पों में देव है । ५ शङ्का - ज्योतिषी देवों की संख्या कितनी है ? समाधान--ज्योतिषी देव असंख्यात हैं, जो जगत्प्रतर को २५६ अंगुल के वर्ग ७ से भाग देने पर प्राप्त होता है। १. धवल पु. ३ पृ. ४६१। २. "वेसेण असखेज्जायो मेडी प्रो ॥३७।। पदरस्स असंवादिभागो ॥३८॥ तासि रोडीगं विलंभ सूची अंगृलं अंगुलबागमूलगुरिणदेरण ||३६॥"[धवल पु. ५ पृ. २६१-२६२] । ३. "क्षेत्तेण पदरस्स संखेज जोयण सदेवकापडिभाएण ।। ४३।।" [धवल पु. ७ पृ. २६३J॥ ४. ' मनेज्जजोयणेत्ति वुत्ते तिपिणजोयरासयमंगुन काऊण ग्गिदे जो उपजदि सो छमन्यो ।" [घवल पु ३ पृ. २७३। ५. धवल पु. ७ पृ. २६५ । ६. "वे सद छप्पणगुल कदि हिद पदरम्स' [विलोकसार मा. ३०२], धवल पु. ७ पृ. २६२।।
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
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