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गाथा ५१६-५२३
यामागगा/५६३
शेष अठारह अंशों का कार्य सेसद्वारस अंसा चउगइगमणस्स कारणा होति । सुक्कुक्कस्ससमुदा सम्बद्ध जांति खलु जीवा ।।५१६॥
गाथार्थ-पाठ मध्य अंशों के अतिरिक्त शेष अठारह अंश चारों गतियों में गमन के कारण होते हैं । शुक्ललेण्या के उत्कृष्ट अंश सहित मरने वाला मनुष्य नियम से सर्वार्थसिद्धि विमान में उत्पन्न होता है।
विशेषार्थ-यदि मरण समय किसी दिगम्बर जैन साधु के यथायोग्य उत्कृष्ट शुक्ल लेश्या रूप परिणाम है। तो वह साधु नियम से सर्वार्थ सिद्धि में जाकर ग्रहम-इन्द्र होता है । इतनी विशेषता है कि उस साधु ने ३३ सागर स्थिति वाली देवायु का बन्ध किया हो. क्योंकि सर्वार्थसिद्धि में ३३ सागर से हीन या अधिक आयु नहीं होती।
प्रवरंसमुदा होंति सदारदुगे मज्झिमंसगेण मुदा । पारणदकप्पादुरि सबढाइल्लगे होति ॥५२०।। पम्मुक्कस्संसमुदा जीवा उवजांति खलु सहस्सारं । अवरंसमुदा जीवा सरणपकुमारं च माहिदं ॥५२१।। मज्झिम अंशेण मुदा तम्मझ जांति तेउजेद्वमुदा । सारणक्कुमार - माहिदंतिमचक्किदसेदिम्मि ।।५२२।। अवरसमुदा सोहम्मोसाणादिमडम्मि सेढिम्मि । मज्झिमयंसेण मुदा विमलविमारणादिबलभद्दे ॥५२३॥
गाथार्थ--- शुक्ललेश्या के जघन्य अंश सहित मरकर शतारद्विक (प्रतार, सहस्रार, आनत, प्राणन) स्वर्गों में उत्पन्न होता है। शुक्ल लेण्या के मध्यम अंश सहित मरकर ग्रानत प्राणत से ऊपर और सर्वार्थसिद्धि से पूर्व के विमानों में उत्पन्न होता है ।। ५२०॥ पद्मवेण्या के उत्कृष्ट अंश सहित मरकर नियम से सहसार युगल में उत्पन्न होता है और जघन्य अंश से मरकर सानत्कुमार और माहेन्द्र स्वर्ग में उत्पन्न होता है ।।५२१।। पद्मले श्या के मध्यम अंग सहित मरकर सानत्कुमार माहेन्द्र के कार और सहस्रार स्वर्ग के नीचे के मध्य के विमानों में उत्पन्न होता है । पीत लेश्या के
१. नर्थगिद्धि की उत्कृष्ट प्राय ३३ सागर है। जघन्य पच्य के अमंग्यात माग कम ३३ सागर है. ऐसा भी कितने ही प्राचार्य स्वीकार करते हैं । लोकविभाग १०१२३४ सिझमूरषि विरचित एवं ति. प. (महासभा प्रकाशन) ८/५१४, भाग ३ पृ. ५.६६; परन्तु मर्वासिद्धिकार (४/१२/१९२), लत्त्वार्थमुत्रकार (४/३२), राजवातिककार (6/३४/१-२/ पृ. २४८) तथा लोकवातिककार. ( माग ६/६५२) आदि सवधिमिद्धि विमान में जघन्य य उत्कृष्ट मा ३३ गागर ही बताते है।