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________________ गाथा ४६६-५०६ लेश्यामार्गणा/५८५ और नील लेश्यानों के सम्बन्ध में कथन है वैसे ही कापोत और नील लेश्यानों के सम्बन्ध में जानना चाहिए। विशेषता इतनी है कि कापोतलेश्या को आदि करके यह कथन करना चाहिए ।' कापोत और तेजोलेश्या के प्राश्रय से अल्पबहत्व का कयन--कापोतलेश्या का जघन्य संक्रम और जघन्य स्थान दोनों ही तुल्य वस्तीक हैं। तेजोलण्या का जघन्य स्थान और जघन्य संक्रम दोनों तुल्य व उनसे अनन्तगुणे हैं। कापोत का जघन्य प्रतिग्रहस्थान अनन्त गुणा है। तेज का जघन्य प्रतिग्रहस्थान अनन्तगुणा है। कापोत का उत्कृष्ट संक्रमस्थान अनन्तगुणा है। तेज का उत्कृष्ट संक्रमस्थान अनन्तगुणा है। कापोल का उत्कृष्ट प्रतिग्रहस्थान अनन्तगुणा है। तेज का उत्कृष्ट प्रतिग्रहस्थान अनन्त गुणा है। कापोत का उत्कृष्ट स्थान अनन्तगुणा है । तेज का उत्कृष्ट स्थान अनन्तगुणा है। तेज प पन लेश्याओं के पाश्रय से संकम व प्रतिग्रह स्थानों के अल्पबहत्व का कयनतेज का जघन्य स्थान स्तोक है। तेज का जघन्य प्रतिग्रहस्थान अनन्त गुणा है । पद्य का जघन्यस्थान और संक्रमण दोनों ही तुल्य व अनन्तगुरणे हैं। तेज का जघन्य संक्रमस्थान अनन्तगुणा है। पद्म का जघन्य प्रतिग्रह अनन्तगुणा है। तेज का उत्कृष्ट प्रतिग्रह अनन्तगुणा है । पद्म का उत्कृष्ट संक्रम अनन्तगुरगा है। तेज का उत्कृष्ट संक्रम और उत्कृष्ट स्थान अनन्तगुणा है । पद्म का उत्कृष्ट प्रतिग्रह अनन्तगुणा है । पद्म का उत्कृष्ट स्थान अनन्तगुणा है।' पनौर शुक्ल लेश्याओं के प्राश्रय से संक्रम व प्रतिग्रह स्थानों का अल्पबहूत्व-पन का जघन्यस्थान स्तोक है। पद्म का जघन्य प्रतिग्रह अनन्तगुणा है। शुक्ल का जघन्य संक्रम और जघन्यस्थान दोनों ही तुल्य व अनन्तगुरणे हैं । पद्म का जघन्य संक्रम अनन्तगुणा है। शुक्ल का जघन्य प्रतिग्रह अनन्तगुणा है । पभ का उत्कृष्ट प्रतिग्रह अनन्तगुणा है । शुक्ल का उत्कृष्ट संक्रम अनन्तमुणा है । पद्म का उत्कृष्ट स्थान और संक्रम अनन्तगुणा है। शुक्ल का उत्कृष्ट प्रतिग्रह अनन्तगुणा है । उत्कृष्ट शुक्ल लेश्या स्थान अनन्तगुणा है। इस प्रकार तीन, चार, पाँच और छह संयोगों के भी अल्पबहुत्व का कथन करना चाहिए। इससे तथा गा. ५१८ की टीका से यह ज्ञात होता है कि कुछ मध्यम अंश ऐसे हैं जो छहों लेण्यायों में पाये जाते हैं। षट्स्थानपतित लेश्यास्थानों का प्रमाण असंड्यात लोक है। उनमें कापोतलेश्या के स्थान स्तोक हैं 1 नीललेश्या के स्थान असंख्यातगुण हैं । कृष्ण लेश्या के स्थान असंख्यातगुणे हैं । तेजोलेश्या के स्थान असंख्यात गुणे हैं। पद्मलेश्या के स्थान असंख्यात गुणे हैं। शुक्ललेश्या के स्थान असंख्यातगुणे - इन छह स्थानों के नाम व परिभा। यद्यपि श्रुतज्ञान के कथन में विस्तारपूर्वक कहे गए हैं तथापि संक्षेप में यहां पर भी कहे जाते हैं---अनन्त भागवृद्धि, असंख्यातभागवृद्धि, संख्यातभागवृद्धि, संख्यातगुणवृद्धि, असंख्यातगुणवृद्धि, अनन्तगुणबृद्धि ये छह वृद्धि हैं; इसी प्रकार छह हानि होती हैं । अनन्त का परिमाण समस्त जीबराशि है। असंख्यात का परिमागा असंख्यात लोक है। संख्यात का १. धवल पु. १६ पृ. ४६६ । २. धवल पु. १६ पृ ४६६-४६७ । ३. घबल पु. १६ पृ. ४६७ । ४. घनल पु. १६ पृ. ४६७ । ५. देखो इसी ग्रन्थ की गाथा २८८ तथा २९२-६५ की टीका । ६. धवल पु. १६ पृ. ५७३ ।
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
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