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________________ ५८४/गो. सा. जीवकाण्ड गाथा ४६६-५०६ के द्वारा पद्म लेश्या से परिणत होता है। इस प्रकार विशुद्धि की हानि (संक्लेश )के द्वारा शुक्ल लेश्या में दो विकल्प होते हैं। शुक्ललेश्या में षट् स्थान पतित वृद्धि के द्वारा स्वस्थान में विशुद्धि की वृद्धि होती है, अन्य लेश्या में संक्रमण नहीं होता। विशुद्धि की वृद्धि के द्वारा शुक्ल लेश्या में एक ही विकल्प है।' ___ कृष्णलेश्या में संक्लेशवृद्धि को प्राप्त हुअा जीव अन्य लेण्या में संक्रमण नहीं करता । संक्लेश की हानि (विशुद्धि) को प्राप्त हुअा जोव, स्वस्थान में छह स्थानों में पड़ता है, अथवा अनन्तगुणे हीन नील लेश्या में पड़ता है। अर्थात् संक्रमण करता है। नीललेण्या में संक्लेशवृद्धि को प्राप्त होकर स्वस्थान में परिगमन करता है अथवा अनन्तगृणे परस्थान स्वरूप कृष्णलेश्या में संक्रमण करता है। नीललेश्यावाला संक्लेश की हीनता (विशुद्धि) को प्राप्त होता हुआ स्वस्थान में छह स्थानों में परिणमन करता है, अथवा अनन्तगुणी हीन परस्थानभूत कायोतलेश्या में संत्रमरा करता है। कापोत लेश्या में संक्लेशवृद्धि को प्राप्त होकर स्वस्थान में द्रह स्थानों में परिणमन करता है, अथवा अनन्तगुणे परस्थान नीललेश्या में संक्रमण करता है। वहीं कापोत लेश्या वाला संक्लेश की हीनता (विशुद्धि) को प्राप्त होता हुआ स्वस्थान में छह स्थानों में परिणमन करता है, अथवा अनन्तगुणी हीन परस्थानभूत तेजालश्या में संक्रमण करता है। तेज(पोत) लेश्या में विशुद्धि को हीनता (सक्लश) को प्राप्त होकर स्वस्थान में छह स्थान में परिणमन करता है. अनन्तगुरणे ऐसे परस्थान स्वरूप कापोतलेश्या में संक्रमण करता है । उसमें विशुद्धि की वृद्धि को प्राप्त होता हुआ स्वस्थान में परिणमन करता है, अथवा अनन्तगुणे परस्थान पद्मलेश्या में संक्रमण करता है। पद्मलेश्या में विशुद्धि की हानि को (संक्लेश को) प्राप्त होकर स्वस्थान में छह स्थानों में नीचे गिरता है अथवा अनन्तगुणी हीन परस्थानभूत तेजलेश्या में संक्रमण करता है। वही पद्म लेश्या वाला विशुद्धि की वृद्धि को प्राप्त होता हा स्वस्थान में छह स्थानों में ऊपर जाता है, अथवा अनन्तगुरणी विशुद्धि, परस्थानभूत शुक्ल लेश्या में संक्रमण करता है। शुक्ललेश्या में विद्धि की हीनता (संक्लेश) को प्राप्त होकर स्वस्थान में छह स्थानों में नीचे गिरता अथवा अमन्तगुरणी हीन परस्थान स्वरूप पालेश्या में संक्रमरण करता है। विशुद्धि की वृद्धि को प्राप्त होता हुआ स्वस्थान में परिणामन करता है, परस्थान में संक्रमण नहीं करता। तीव-मन्दता की अपेक्षा जघन्य व उत्कृष्ट और प्रतिग्रह-स्थानों के अल्पबहुत्व इस प्रकार हैं- कृष्ण व नौल लेश्या के प्राश्रय से कथन इस प्रकार है-नील लेश्या का जघन्यस्थान स्तोक है । नीललेश्या के जिस स्थान में कृष्णलेण्या से प्रतिग्रहण होता है वह नीललेण्या का जघन्य प्रतिग्रह स्थान उसमे अनन्तगुणा है । कृष्ण का जघन्य संक्रम स्थान और जघन्य कृष्णस्थान दोनों ही तुल्य व अनन्न गुणे हैं । नील का जघन्य संक्रम स्थान अनन्तगुरणा है । कृष्ण का जघन्य प्रतिग्रहस्थान अनन्तगुणा है । नील का उत्कृष्ट प्रतिग्रह स्थान अनन्तगुणा है । कृष्ण का उत्कृष्ट संक्रम स्थान अनन्त गुणा है । नील का उत्कुष्ट संक्रम स्थान और उत्कृष्ट नील स्थान बोनों ही तुल्य व अनन्तगुणे है । कृष्रग का उत्कृष्ट प्रतिग्रह स्थान अनन्तगुगया है। उत्कृष्ट कृष्ण लेश्या स्थान अनन्तगुणा है।' नील व फापोत लेश्यानों के प्राश्रय से संक्रम व प्रतिग्रह स्थानों का प्रल्पबहुत्व-जंसा कृष्ण १. धवल पु. १६ पृ. ४६५। २. धवल पु. १६ पृ. ५७२-५७३ । ३. धवल पु. १६ पृ. ४६६ ।
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
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