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गाथा ४८२-४८३
दर्शन मार्गगा / ५६७
होकर ही विशेष की उपलब्धि होती है । यदि सामान्य और विशेष का सर्वथा स्वतंत्र सद्भाव मान लिया जाये तो समस्त ज्ञान या तो संकर रूप हो जायेंगे या श्रालम्बन रहित हो जायेंगे । पर ऐसा है नहीं, क्योंकि ऐसा होने पर उनका ग्रहण ही नहीं हो सकता ।
अतः जबकि सामान्यविशेषात्मक वस्तु है तो केवलदर्शन को केवल सामान्य का विषय करने वाला मानने पर और केवलज्ञान को केवल विशेष का विषय करनेवाला मानने पर दोनों उपयोग का प्रभाव प्राप्त होता है। केवल सामान्य और केवल विशेष रूप पदार्थ नहीं पाये जाते हैं । कहा भी है
fer on केवल एसो हु भासइ सया वि 1
एय समयम्मि हंदि हु वयणविसेसो रग संभव ॥ १४० ॥
अण्णादं पासंतो प्रविट्टमरहा सया बियाणंतो ।
fe जाइ कि पास कह सवष्तु सिधा होइ ।। १४१ । । १
यदि दर्शन का विषय केवल सामान्य श्रीर ज्ञान का विषय केवल विशेष माना जाय तो केवली जिन जो श्रदृष्ट हैं ऐसे ज्ञात पदार्थ को तथा जो प्रज्ञात है ऐसे इष्ट पदार्थ को ही सदा कहते हैं, यह आपत्ति प्राप्त होती है। इसलिए एक समय में ज्ञात और दृष्ट पदार्थ को केवली जिन कहते हैं यह वचन विशेष नहीं बन सकता है। अज्ञात पदार्थ को देखते हुए और ग्रहष्ट पदार्थ को जानते हुए ग्रहन्त देव क्या जानते हैं और क्या देखते हैं ? तथा उनके सर्वज्ञता भी कैसे बन सकती है ।
उपर्युक्त दोष प्राप्त न हो, इसलिए अन्तरंग उद्योत केवलदर्शन है और बहिरंग पदार्थों को विषय करने वाला प्रकाश केवलज्ञान है। ऐसा स्वीकार कर लेना चाहिए। दोनों उपयोगों की एक साथ प्रवृत्ति मानने में विरोध भी नहीं आता, क्योंकि उपयोगों की क्रमवृत्ति कर्म का कार्य है और कर्म का अभाव हो जाने से उपयोग की क्रमवृत्ति का प्रभाव हो जाता है। इसलिए निरावरण केवलज्ञान और केवलदर्शन की क्रमवृत्ति के मानने में विरोध आता है । "
शङ्का - श्रात्मा को विषय करने वाले उपयोग को दर्शन स्वीकार कर लेने पर आत्मा में कोई विशेषता नहीं होने से चारों (चक्षु प्रचक्षु अवधि और केवल ) दर्शनों में भी कोई भेद नहीं रह जाएगा ।
समाधान - यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि जो दर्शन जिस ज्ञान का उत्पन्न करने वाला स्वरूपसंवेदन है, उसे उसी नाम का दर्शन कहा जाता है। चक्षु इन्द्रियावरण कर्म के क्षयोपशम से उत्पन्न हुए ज्ञान के विषय भाव को प्राप्त जितने पदार्थ हैं, उतने ही श्रात्मा में स्थित क्षयोपशम उन-उन संज्ञाओं को प्राप्त होते हैं । और उनके निमित्त से आत्मा भी उतने प्रकार का हो जाता है । अत: इस प्रकार की शक्तियों से युक्त आत्मा के संवेदन करने को दर्शन कहते हैं । ४ ज्ञान का उत्पादन करने वाले प्रयत्न से सम्बद्ध स्त्रसंवेदन, अर्थात् ग्रात्मविषयक उपयोग को दर्शन कहते हैं। इस दर्शन में ज्ञान
१. जयघवल पु. १ पृ. ३५३ द्वितीयावृत्ति के पृष्ठ ३२१-२२ । २. जयधवल पु. १ पृ. ३५६ मा १४०-४१ । ३. जयधवल पु. १ पृ. २५६-२५७ । ४. धवल पु. १ पृ. ३६१-३८२ ।