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________________ ५६६/गो. सा. जीवकाण्ड गाथा ४८२-४८३ याद्वार्थ के अग्रहण के अन्तिम समय तक दर्शनोपयोग होता है, ऐसा ग्रहण करना चाहिए, क्योंकि इसके बिना दर्शन व ज्ञानोपयोग से भिन्न भी जीव के अस्तित्व का प्रसंग पाता है।' आत्मविषयक उपयोग 'दर्शन' है। यह दर्शन ज्ञानरूप नहीं है, क्योंकि ज्ञान वाह्य अर्थ को विषय करता है। तथा बाह्य और अन्तरंग विषय वाले ज्ञान और दर्शन के एकता नहीं है, क्योंकि वैसा मानने में विरोध पाता है। और न ज्ञान को ही दो शक्तियों से युक्त माना जासकता है, क्योंकि पर्याय के अन्य पर्याय का प्रभाव माना गया है। शङ्का–बाह्य पदार्थ को सामान्य रूप से ग्रहण करना दर्शन और विशेष ग्रहण का नाम ज्ञान है, ऐसा क्यों नहीं ग्रहण करते, क्योंकि कितने ही प्राचार्यों ने ऐसा कहा है ? समाधान-यह कथन समीचीन नहीं है, क्योंकि सामान्य ग्रहण के बिना विशेष के ग्रहण का अभाव होने से संसार अवस्था में अर्थात् छयस्थों के भी, केबली के समान, ज्ञान और दर्शन की अक्रम अर्थात् युगपत् प्रवृत्ति का प्रसंग पाता है । तथा 'सामान्य को ग्रहण करने वाला दर्शन' ऐसी परिभाषा मान लेने पर ज्ञान और दर्शन की छद्मस्थ अवस्था में क्रमशः प्रवत्ति भी नहीं बनती है, क्योंकि सामान्य से रहित विशेष कोई वस्तु नहीं है और अवस्तु में ज्ञान की प्रवृत्ति होने का विरोध है। यदि अवस्तु में ज्ञान को प्रवृत्ति मानी जाएगी तो ज्ञान के प्रमाणता नहीं मानी जा सकती, क्योंकि वह वस्तु का अपरिच्छेदक है। केवल विशेष कोई वस्तु भी नहीं है, क्योंकि उसके अर्थक्रिया की कर्तृता का अभाव है। इसलिए "सामान्य नाम प्रात्मा का है," क्योंकि वह सकल पदार्थों में (जान के द्वारा) साधारण रूप से व्याप्त है। इस प्रकार के सामान्य रूप प्रात्मा को विषय करने वाला उपयोग दर्शन है। केवलज्ञान ही अपने पाप का और अन्य पदार्थों का जानने वाला है, इस प्रकार मानकर कितने ही लोग केवलदर्शन के प्रभाव को कहते हैं। किन्तु उनका यह कथन युक्ति-संगत नहीं है, क्योंकि केवलज्ञान स्वयं पर्याय है। पर्याय के दूसरी पर्याय होती नहीं है, इसलिए केवल ज्ञान के स्व और पर को जाननेवाली दो प्रकार की शक्तियों का अभाव है। यदि एक पर्याय के दूसरी पर्याय का सद्भाव माना जाएगा तो पानेवाला अनवस्था दोष किसी के द्वारा भी नहीं रोका जा सकता है, इसलिए आत्मा ही स्व और पर का जाननेवाला है। उनमें स्वप्रतिभास को केवल दर्शन और परप्रतिभास को केवलज्ञान कहते हैं। केवल सामान्य तो है नहीं, क्योंकि अपने विशेष को छोड़ कर केवल तद्भाव सामान्य और सादृश्यलक्षगा सामान्य नहीं पाये जाते। यदि कहा जाय कि सामान्य के बिना सर्वत्र समान प्रत्यय और एक प्रत्यय की उत्पत्ति बन नहीं सकती है, इसलिए सामान्य नाम का स्वतन्त्र पदार्थ है, सो ऐसा कहना युक्त नहीं है, क्योंकि एक का ग्रहण अनेकानुविद्ध होता है और समान का ग्रहण असमानानुविद्ध होता है। अतः सामान्यविशेषात्मक वस्तु को विषय करने वाले जात्यन्तरभूत झानों की ही उत्पत्ति देखी जाती है। इससे प्रतीत होता है कि सामान्य नाम का कोई स्वतंत्र पदार्थ नहीं है। तथा सामान्य से सर्वथा भिन्न विशेष नाम का भी कोई पदार्थ नहीं है, क्योंकि सामान्य से अनुविद्ध १. प. पु. ११ पृ. ३३३ । २. घ.पु. ६ पृ. ६. पु. १३ पृ. २०७-२०८ । ३. ध.पु. ६ पृ. ३३ व पु. १३ पृ. २०८ । ४. घ. पु. ६ पृ. ३३-३४। ५ ध. पु ६ पृ. ३४ |
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
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