________________
गाथा ४८२-४०३
दर्शन मार्गा/ ५६५
ही किया गया है। यहां जीव सामान्य रूप है, इसलिए उसका ग्रहण दर्शन है। यहाँ पर सामान्य विशेषात्मक आत्मा का सामान्य शब्द के वाच्य रूप से ग्रहण किया है।"
शङ्का - जिसके द्वारा देखा जाय, जाना जाय वह दर्शन है। यदि दर्शन का इस प्रकार लक्षण किया जाय तो ज्ञान और दर्शन में कोई विशेषता नहीं रह जाती, दोनों एक हो जाते हैं ?
समाधान -- नहीं क्योंकि अन्तर्मुख चित्प्रकाश ( चैतन्य स्वरूपसंवेदन) को दर्शन और बहिर्मुख चित्प्रकाश को ज्ञान माना है। इसलिए दोनों के एक होने में विरोध श्राता है ।
शङ्का - अपने से भिन्न बाह्य पदार्थों के ज्ञान को प्रकाश कहते हैं इसलिए अन्तर्मुख चैतन्य प्रकाश और बहिर्मुख चैतन्य प्रकाश के होने पर जिसके द्वारा यह डी को सौर पर पदार्थों को जानता है, वह ज्ञान है । इस प्रकार की व्याख्या के सिद्ध हो जाने पर ज्ञान और दर्शन में एकता श्रा जाती है, इसलिए उनमें भेद सिद्ध नहीं हो सकता ?
समाधान - ऐसा नहीं है, क्योंकि जिस तरह ज्ञान के विशेष रूप से प्रतिनियत कर्म की व्यवस्था होती है, उस तरह इन दोनों में भेद है।
द्वारा यह घट है, यह पट है, इत्यादि दर्शन के द्वारा नहीं होती है, इसलिए
श्रथवा अन्तरंगोपयोग को दर्शनोपयोग कहते हैं। कारण यह है कि आकार का अर्थ कर्म (object) कर्तृत्व है, उसके बिना जो अर्थोपलब्धि होती है, उसे अनाकार उपयोग कहा जाता है । "
शङ्का - तरंग उपयोग में भी कर्मकर्तृत्व होता है ?
समाधान - ऐसी प्राशंका नहीं करनी चाहिए, क्योंकि उसमें कर्ता से भिन्न द्रव्य व क्षेत्र स्पष्ट कर्म का प्रभाव है ।
शङ्का - आकार किसे कहते हैं ?
समाधान- प्रमाण से पृथग्भूत कर्म को प्रकार कहते हैं । अर्थात् प्रमाण में अपने से भिन्न
जो विषय प्रतिभासमान होता है, वह आकार है। वह श्राकार जिस उपयोग में नहीं पाया जाता है वह उपयोग अनाकार अर्थात् दर्शनोपयोग कहलाता है। * सकल पदार्थों के समुदाय से अलग होकर बुद्धि के विषयभाव को प्राप्त हुआ कर्मकारक आकार कहलाता है । "
शङ्का – बाह्य अर्थ के ग्रहण के उन्मुख होने रूप जो अवस्था होती है, वही दर्शन है ? समाधान- ऐसी बात नहीं है, किन्तु बाह्यार्थ ग्रहण के उपसंहार के प्रथम समय से लेकर,
१. "प्राथम्मि पत्तसामण्णा सग्गहङ्गादो ।" [धवल पु. ७ पृ. १००] "जीवो सामण्णं गाम, तस्स ग्रहणं दंसणं" [घवल पु. १३ पृ. २५४] "सामान्यविशेषात्मकस्यात्मनः सामान्यशब्दवाच्यत्वेनोपादानात्" [ धवल पु. १५. ३०० ] ज. घ. १ पृ. ३ । २. धवल पु. १ पृ. १४६ । २. घथल गु. ११ पृ. ३३३ घवल पु. १३ पृ. २०७ । ४. भवल पु. ११ पृ. ३३३ व १३ पृ. २०७ २०८५ जयधवल पु. १ पृ. ३३१ । ६. जयधवल पु. १ पृ. ३३८ ।