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________________ गाथा ४७६-४७७ संयममार्गणा/५४७ की भी निवृत्ति हो जाने के कारण, पंच महाव्रतों की परिणति को (महायतों जैसी अवस्था को) प्राप्त होते हैं। इति नियमितदिग्भागे प्रवर्तते यस्ततो बहिस्तस्य । सकलासंयमबिरहावयहिंसावतं पूर्णम् ॥१३८॥ [पुरुषार्थसिद्धय पाय | --इस प्रकार जो मर्यादाकृत दिग्विभाग में प्रवृत्ति करता है, उसके उस क्षेत्र से बाहर समस्त असंयम के त्याग के कारण, अहिंसाव्रत पूर्ण हो जाता है अथवा परिपूर्ण अहिंसावत होता है। अनर्थदण्ड -उपकार न होकर जो प्रवृत्ति केवल पाप का कारण है वह अनर्थदण्ड है। इससे विरत होना अनर्थदण्डविरति है।' अभ्यंतरं विगवधेरपायिकेभ्यः सपापयोगेभ्यः । विरमणमनर्थदण्डवतं विद्युतधराऽग्रण्यः ॥७४॥ [रत्नकरण्डश्रावकाचार] -दिशाओं की मर्यादा के भीतर निष्प्रयोजन पापयोगों से (पापमय मन, वचन, काय की प्रवृत्तियों से) जो विरक्त होना है, व्रतधारियों में अग्रणी मणघरदेव उसे अनर्थदण्डवत कहते हैं। मनमः पात्र मारता-सामान, पापोपदेश, प्रमादचरित, हिंसाप्रदान और अशुभ श्रुति । दूसरों का जयपराजय, मारना, बाँधना, अंगों का छेदना और धन का अपहरण आदि कैसे किया जाय? इस प्रकार मन से विचार करना अपध्यान नाम का अनर्थदण्ड है ।२ वध-बन्ध-च्छेदावेद्वेषाद्रागाच्च परकलत्रादेः । आध्यानमपध्यानं शासति जिनशासने विशदाः ॥७॥ [रत्नकरण्डश्रावकाचार] -द्वेषभाव से किसी को मारने-पीटने-बांधने या उसके अंगच्छेदनादि का तथा किसी की हार अर्थात् पराजय का और रागभावों से परस्त्री प्रादि का अर्थात् दूसरों की जय व पुत्र-धन-धान्य आदि की वृद्धि का जो निरन्तर चिन्तन है अर्थात् व्यर्थ का मानसिक व्यापार है, उसे जिनशासन में गणधर देव ने अपध्यान नाम का अनर्थदण्ड कहा है। उससे विरति अपध्यान नामक अनर्थदण्डवत है। पापद्धिजयपराजयसङ्गरपरदारगमनचौर्यायाः । न कवाचनापि चिन्त्या, पापफलं केवलं यस्मात् ॥१४१॥ [पुरुषार्थसिद्धय पाय –शिकार, जय, पराजय, युद्ध, परस्त्री-गमन, चोरी आदिक का किसी समय में भी नहीं चिन्तन करना चाहिए, क्योंकि इन अपध्यानों का फल केवल पाप ही है। यह अपध्यान नामक अनर्थ दण्ड है । इससे बिरतिभाव वन है । तिर्यंचों को क्लेश पहुँचाने वाले वगिज का प्रसार करने वाले और प्राणियों की हिंसा के कारणभूत आरम्भ आदि के विषय में पापबहुल वचन बोलना पापोपदेश नामका अनर्थदण्ड है। ----- १. गर्षि प७ि /२१ । २. ससिदि७/२१ । ३. ससिजि ७/२१ ।
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
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