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________________ ५४६/27. ता. जीवका गाथा ४७६-४७७ गृहस्थ स्नेह और मोहादिक के वश से गृहविनाश और ग्रामविनाश के कारण असत्य वचन से निवृत है, इसलिए उसके दूसरा सत्याणुव्रत होता है। श्रावक राजा के भय आदि के कारण तथा दूसरे को पीडाकारी जानकर बिना दी हुई वस्तु को लेना छोड़ देता है। साथ ही बिना दी हुई वस्तु के लेने से उसकी प्रीति घट जाने के कारण उसके तीसरा अचौर्याणवत होता है। स्वीकार की हुई या बिना स्वीकार की हुई परस्त्री का संग करने से जिसकी रति हट जाती है उसके परस्त्रीत्याग नामका चौथा अणुव्रत होता है। गृहस्थ धन, धान्य और क्षेत्र प्रादि का स्वेच्छा से परिमाण कर लेता है, इसलिए उसके पांचवां परिग्रह परिमारण अणुव्रत होता है ।' तीन गुणवत-दिग्वत, देशव्रत, अनर्थदण्डवत अथवा दिग्वत, अनर्थदण्डवत, भोगोपभोगपरिमाण व्रत । शङ्का-इनको गुणवत क्यों कहा गया है ? समाधान-क्योंकि ये पाठ मूलगुरणों को अथवा पूर्वोक्त पाँच अणुव्रतों की वृद्धि करते हुए उनमें उत्कर्षता लाते हैं। दिग्वतः-पूर्वादि दिशाओं में प्रसिद्ध चिह्नों के द्वारा मर्यादा करके नियम करना दिग्विरतिव्रत है । उस मर्यादा के बाहर प्रस-स्थावर हिंसा का त्याग हो जाने से उत्तने ग्रंश में महावत होता है। मर्यादा के बाहर लाभ होते हुए भी उसमें परिणाम न रहने के कारण लोभ का त्याग हो जाता है । प्रविधाय सुप्रसिद्ध मर्यादा सर्वतोप्यभिज्ञानैः । प्राच्याविभ्यो दिग्भ्यः कर्तध्या विरतिरविचलिता ॥१३७॥ [पुरुषार्थ सिद्धघ पाय] -~-सुप्रसिद्ध ग्राम नदी पर्वतादि नाना चिह्नों से सब मोर मर्यादा को करके पूर्वादि दिशाओं से गमन न करने की प्रतिज्ञा करना दिग्बत है। "दिसिविदिसिमाण पढम" अर्थात दिशाओं और विदिशाओं का परिमारग करना प्रथम गृणव्रत है । अर्थात् पूर्व, दक्षिण, पश्चिम और उत्तर ये चार दिशाएं हैं तथा ऐशान, आग्नेय, नैऋत्य, वायव्य, ऊर्ध्व और अधो ये छह विदिशाएं हैं। इनमें आने-जाने की सीमा करना पहला विग्यत नामक गुणवत है। दिग्वलयं परिगणितं कृत्वाऽतोऽहं बहिर्न यास्यामि । इति संकल्पो दियतमामृत्यणुपाप-विनिवृत्यै ॥६॥ [रत्नकरण्डधारकाचार अवधर्वहिरणपाप-प्रतिविरतेदिग्वतानि धारयताम् ।। पंचमहाव्रतपरिणतिमणुक्तानि प्रपद्यन्ते ।।७०॥ [रत्नकरण्डश्रावकाचार] दशों दिशाओं को मर्यादित करके जो सुक्ष्म पाप की निवृत्ति के अर्थ मरणपर्यन्त के लिए यह संकल्प करता है कि 'मैं दिशाओं की इस मर्यादा से बाहर नहीं जाऊंगा' यह दिशाओं से विरतिरूप 'दिग्बत' कहा जाता है । दिशाओं के नत धारगा करने वाले के अणुव्रत, मर्यादा के बाहर सूक्ष्म पापों १. सर्वार्थसिद्धि ७।२। २. त. स. ७।२१: पृषार्थसिद्धय पाय गा. १३५-१४५। ३. चारित्रपाहुड गा, २४; रत्नकरण श्रावकाचार पलो. ६७ टीका। ४. स. सि २१ । ५. चारित्रपाहुद्ध गा. २४ ।
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
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