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गाथा ४७६-४.१७
संयममागणा/५४१
मोह के उपशम या क्षय के बिना प्राप्त नहीं किया, वह अथाख्यात संयम है। प्रध शब्द का प्रानन्तर्य अर्थ है, अर्थात् जो मोह के उपशम या क्षय के अनन्तर प्रकट होता है । अथवा इस संयम को यथाख्यात इसलिए कहते हैं कि जसा परिपूर्ण शुद्ध आत्मस्वरूप है, वैसा ही इसमें प्राख्यात | प्राप्त होता है।'
शङ्का-मोहनीयकर्म को अशुभ क्यों कहा गया है ?
समाधान-मोहनीयकर्म ही संसार की जड़ है । मोहनीय कर्मोदय से रागद्वेष होते हैं जिनके कारण कर्मबन्ध होता है इसलिए मोहनीय कर्म को अशुभ कहा गया है।
"रत्तो बंधदि कम्म मुचदि जीयो विरागसंपत्तो" ॥१५० पूर्वार्ध ॥ [ समयसार] रागीऔर कर्म को जाता है और वार को प्राप्त हुमा कर्मों से टूटता है । "रत्तो बंधदि कम्मं मुच्चवि कम्मेहिं रागरहिदप्पा पूर्वार्धं २।७।। [प्रवचनसार] रागी जीव कर्मों को बांधता है और रागरहित प्रात्मा कर्मों से मुक्त होता है । शङ्खा -- योग भी तो बन्ध का कारण है ? समाधानः- जो कपायी जीव हैं उनके योग से मात्र ईपिथ आस्रव होता है । "सकपाधाकषाययोः साम्परायिकर्यापथयोः" ।।४।। [त. सू. अध्याय ६ ]
कषाय सहित के साम्परायिक प्रास्रव होता है और कषाय रहित के ईपिथ प्रास्रव होता है अर्थात् अगले समय में अकर्म भाव को प्राप्त हो जाता है। इसलिये योग वन्ध का कारण नहीं है, योग के साथ जो कषाय है वही बन्ध का कारण है।
'सकषायत्याज्जीवः कर्मणो योग्यान् पुद्गलानावत्ते स बन्धः" ॥२॥ [त. सू. अ. ८]
जीव कषायसहित होने से जो कर्मों के योग्य पुद्गलों को ग्रहण करता है वह बन्ध्र है। इस सूत्र से भी स्पष्ट है कि कषाय वन्ध का कारण है।
देशविरत का स्वरूप पंचतिहिचहु विहेहि य अणुगुणसिक्खावएहि संजुत्ता । उच्चंति देसविरया सम्माइट्टी झलियकम्मा ॥४७६।।* वंसरणवयसामाइय पोसहसचित्तरायभत्ते य । बह्मारंभपरिग्गह अणुमण मुद्दिट्ठदेसविरदेदे ।।४७७॥
१. रा. वा. ६।१८।११-१२। २. घ. १ पृ. ३७३ गाथा ११२, प्रा. पं. स. भ. १ गाथा १३५ चारित्र प्रामत गाधा २२। ३.ध.११ पृ. ६७३ माथा ११३ पु.६ प्र. २०१ गाथा ७४; प्रा. प. म. प्रध्याय १ गाथा १३६, चारित्र पाहु गाथा २१, बारस अणुबेक्वा गाथा ६६ वसुनन्दि थावकाचार गाथा ४।