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________________ संयम मार्ग ५३५ चारित्रमोहनीय कर्म के उपराम से उपशान्तकपाव गुरुस्थान होता है और क्षय से क्षीणमोह आदि गुणस्थान होते हैं । उपशान्तकपाय, क्षीणकषाय आदि गुणस्थानों में यथाख्यात विहारशुद्धिसंयम की प्राप्ति होने से श्रमिक व क्षायिक लधि से यात संयम होता है। ऐसा कहा गया है । จ गाथा ४६९ तदिय कसादये य विरदाविरदो गुणो हवे जुगवं । विदिक सादरण य प्रसंजमो होदि यिमेर ||४६६ || गाथार्थ -- तीसरी कषाय के उदय से विरताविरत गुणस्थान होता है। दूसरी कपाय के उदय से नियम से संयम होता है ॥४६६ || विशेषार्थ – कपायें चार प्रकार की हैं। उनमें से प्रथम कषाय अनन्तानुबन्धी है, द्वितीय कषाय अप्रत्याख्यातावरण है, तृतीय कषाय प्रत्याख्यानावरण है और चतुर्थ कपाय संज्वलन है । इनमें से प्रथम अर्थात् ग्रनन्तानुबन्धी कषाय सम्यवत्व का घात करती है अर्थात् अनन्तानुबन्धी कषायोदय के अभाव में सम्यग्दर्शन उत्पन्न होता है । प्रत्याख्यानावरण नामक द्वितीय कषाय देशसंयम का घात करती है । देशसंयम को विरताविरत, संयमासंयम, देशव्रत एवं अणुव्रत भी कहते हैं। इसके उदय के अभाव में देशसंयम उत्पन्न होता है। तृतीय प्रत्याख्यानावरण कषाय के उदय मे देशसंयम हो संज्वलन सकता है, किन्तु संयम नहीं हो सकता, क्योंकि तृतीय कषाय सकलसंयम की घातक है । चतुर्थ कषाय के उदय में सकल संयम तो हो सकता है, किन्तु यथाख्यातशुद्धि संयम नहीं हो सकता, क्योंकि संज्वाय यथास्यात संयम की घातक है । २ 'तीसरी कपाय का उदय' इसका अभिप्राय यह है कि जिसके प्रथम दो कृपाय का उदय नहीं है, किन्तु तृतीय कषाय का उदय है, क्योंकि कषायों के उदय का प्रभाव प्रथम श्रादि के क्रम से होता है। तृतीय कषाय का उदय सकलसंयम का तो घात करता है किन्तु विरताविरत, (संयमासंयम या देशसंयम ) का घात नहीं करता । जिसके प्रथमादि दो कषायों के उदयाभाव होने से विरताविरत उत्पन्न हो गया है, किन्तु तृतीय कषायोदय के कारण सकलसंयम उत्पन्न नहीं हुआ है, किन्तु विरताविरत का बात भी नहीं हुआ है, इस अपेक्षा से तृतीय कषाय के उदय को विरताविरत पंचम गुणस्थान का कारण कहा है। 'तृतीय कषायोदय' में प्रथम व द्वितीय कषायोदय का प्रभाव गर्भित है । वास्तव में प्रथम व द्वितीय कषायोदय का अभाव विरताविरत गुणस्थान का कारण है । कपायोदय होने पर एकदेशसंयम भी नहीं हो सकता है अतः प्रप्रत्याख्यानावरण के उदय में जीव असंयमी रहता है। जिसके प्रत्याख्यानावरण का उदय है उसके ऊपर की काय प्रत्याख्यानावरण व संज्वलन कषाय का उदय अवश्य होता है । अप्रत्याख्यानावर जीव क्षायोपशमिक लब्धि से संयतासंयत होता है। चार संज्वलन और नव नोकपायों के क्षयोपणम संज्ञावाले देशघाती स्पर्धकों के उदय से संयमासंयम की उत्पत्ति होती है। प्रत्याख्यानावरण के सर्वघातीकों के उदय से जिन चार संज्वलनादिक देशघाती स्पर्धकों का उदय प्रतिहत हो गया है उस उदय के संयमासंयम को छोड़कर संयम उत्पन्न करने का सामर्थ्य नहीं है।' अर्थात् प्रत्याख्या २. गो. क. गा. ४५ : गो. जी. गा. २८२ । ३. धवल पु ७ पृ. २४ सूत्र ५१ । १. धनल पु. ७ पृ. ९५ । ४. धवल 3. ७ पु. ६४ ।
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
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