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________________ गाथा ४४-४४३ ज्ञानमार्गा /५१६ पर चढ़ता है उसके भी हो मकता है और जो क्षपक श्रेणी पर नहीं चढ़कर उपशमश्रेणी पर चढ़ता है या नहीं भी चढ़ता है उसके भी हो सकता है। इस प्रकार ऋज़मति मनःपर्यय ज्ञान और विपुल मति मनःपर्ययज्ञान का परस्पर विशुद्धि व प्रतिपात की अपेक्षा कथन किया गया। परमरणसिट्रियमः ईहामविरणा उजद्रियं लहिय । पच्छा पच्चक्खेरग य उजुमदिरणा जाणदे रिणयमा ॥४४८।। चितियचितियं वा अद्ध चितियमयभेयगयं । प्रोहि वा विउलमदी लहिऊरण विजारगए पच्छा ।।४४६।। गाथार्थ-दूसरे के मन में ऋजु स्थित अर्थ को ईहा मतिज्ञान के द्वारा ग्रहण करके पीछे ऋजुमति मनःपर्ययज्ञान के द्वारा नियम से प्रत्यक्ष जानता है ।।४४८॥ चिन्तित, अचिन्तित, अर्घचिन्तित इत्यादि अनेक भेदों से युक्त पदार्थ को ग्रहण करके पश्चात् विपुलमति मनःपर्ययज्ञान अवधिज्ञानबत् प्रत्यक्ष जानता है ।। ४४६।। विशेषार्थ- मतिज्ञान के द्वारा दूसरों के मानस (मन में उत्पन्न हुए चिह्न) को ग्रहण करके ही मनःपर्ययज्ञान के द्वारा मन में स्थित अर्थ को जानता है, यह उक्त कथन का तात्पर्य है।' मन अर्थात् मतिज्ञान के द्वारा मानस को अर्थात् मनोवर्गणा के स्कन्धों से निष्पन्न हुई नोइन्द्रिय को ग्रहण करके पश्चात् मनःपर्ययज्ञान के द्वारा जानता है। शङ्का · नोइन्द्रिय अतीन्द्रिय है, उसका मतिज्ञान के द्वारा कैसे ग्रहण होता है ? समाधान--नहीं, क्योंकि ईहारूप लिंग के अवलम्बन के बल से अतीन्द्रिय अर्थों में भी मतिज्ञान की प्रवृत्ति देखी जाती है। अथवा मन अर्थात् मतिज्ञान के द्वारा मानस अर्थात् मतिज्ञान के विषय को ग्रहण करके पश्चात् मनःपर्ययज्ञान प्रवृत्त होता है, ऐसा कथन करना चाहिए।' ऋजुमति मनःपर्ययज्ञान चिन्तित अर्थ को भी जानता है, किन्तु विपुलमति ज्ञान चिन्तित, अचिन्तित और अर्धचिन्तित अर्थ को भी जानता है। पैतालीस लाख योजन के भीतर विद्यमान चिन्तित, अर्धचिन्तित व अचिन्तित अर्थ को प्रत्यक्ष जानता है।' इसका विशेष कथन गाथा ४३८ के विशेषार्थ में किया जा चुका है। १. "मदिरणागेण पति मणं घेलूगा चेत्र भागपज्जवणाणण मरणम्मिट्टिदप्रत्ये जागदि ति मगिदं होदि ।" [घ.पु.१३ पृ. ३३.२ । २. "मणेश मदिरगाणेग, मागासं गोइदियमणोवग्गणस्खंघरिणत्तिदं. पडिबिदइत्ता घेत्तण पच्छा मरण पज्जवरणारोण जागादि । गोइदियमदिदियं काध मदिरगाणेगा घेण्पदे ? ण, ईहालिगाव भबलेग अदिदिएस नि प्रत्येसु बुलिदंसगादो । अथवा मणेरण मदिमााणेगा माग.सं मदिनागविण्यं पढिविदइत्ता तवलंभिय पच्छा मणपज्जवणाणं पयदि त्ति वत्तव्वं ।” [व.पु. १३ पृ. ३४१] । ३. "कित बित्तियचिति यमद्धचितिय च जाणदि'' [ध.पु.१३ ४ ३२६] । ४. "घितिम-प्रचिनिय-अचिंतियवस्थाणं पग दालीम जोयशासक्खध्मनरे बट्टमारणारा जपच्चलेगा परिच्छिति कृराई" [ज.प.पु. १.४३] ।
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
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