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________________ ५१८ / गो. सा. जीवकाण्ड गाथा ४४५-४४७ शङ्का - ऋजुमति मन:पर्ययज्ञानी मन से अचिन्तित, वचन से अमुक्त और अभिनीत (शारीरिक चेष्टा के श्रविषयभूत) अर्थ को क्यों नहीं जानता ? समाधान- नहीं जानता, क्योंकि उसके विशिष्ट क्षयोपशम का प्रभाव है।" ऋजुमति मन:पर्ययज्ञानी अन्विन्तित अनुक्त और अभिनीत अर्थ को नहीं जान सकता, इसलिए ऋजुमतिमन:पर्ययज्ञान को मन, बचन व काय के व्यापार की अपेक्षा करनी पड़ती है । किन्तु विपुलमतिमन:पर्ययज्ञानी प्रचिन्तित अर्थ को भी जानता है (गो. जी. गा. ४३८) अतः उसे इन्द्रिय, नो इन्द्रिय और योग की अपेक्षा नहीं करनी पड़ती। शंका- यह ज्ञान मन सम्बन्ध से होता है अतः इसे मतिज्ञान होने का प्रसङ्ग आता है ? समाधान- नहीं, क्योंकि मन:पर्यय ज्ञान में मन की अपेक्षा मात्र है । यद्यपि वह केवल क्षयोपशम शक्ति से अपना कार्य करता है, तो भी केवल स्व और पर के मन की अपेक्षा उसका व्यवहार किया जाता है। जैसे --' आकाश में चन्द्रमा को देखो' यहाँ आकाश की अपेक्षा मात्र होने से ऐसा व्यवहार किया गया है। अर्थात् यहाँ मन की अपेक्षा मात्र है। दूसरों के मन में अवस्थित अर्थ को यह जानता है, इतनी मात्र यहाँ मन की अपेक्षा है । "विशुद्ध्यप्रतिपाताभ्यां तद्विशेषः ॥२४॥ विशुद्धि और अप्रतिपात की अपेक्षा ऋजुमति और विपुलमति इन दोनों मन:पर्ययज्ञानों में अन्तर है । है, किन्तु विपुलमति मन:पर्ययज्ञान विशुद्धतर और प्रतिपाती है। अतः ऋजुमति कम विशुद्ध और प्रतिपाती उपशान्त मन:पर्ययज्ञानावरण कर्म का क्षयोपशम होने पर ग्रात्मा में जो निर्मलता आती है, वह विशुद्धि है। गिरने का नाम प्रतिपात है और नहीं गिरना श्रप्रतिपात है। कपाय जीव का चारित्रमोहनीय के उदय से संयम - शिखर छूट जाता है जिससे प्रतिपात होता है और क्षीणकषाय जीव के पतन का कारण न होने से प्रतिपात नहीं होता । इन दोनों की अपेक्षा ऋजुमति और विपुलमति में भेद है। ऋजुमति से विपुलमति द्रव्य, क्षेत्र, काल और भात्र की अपेक्षा विशुद्धतर है । उत्तरोत्तर सुक्ष्म द्रव्य को विषय करनेवाला होने से ही विशुद्धि जान लेनी चाहिए, क्योंकि इनका उत्तरोत्तर प्रकृष्ट क्षयोपशम पाया जाता है, इसलिए ऋजुमति से विपुलमति में विशुद्धि अधिक है । * प्रतिपात की अपेक्षा भी विपुलमति विशिष्ट है, क्योंकि इसके स्वामियों के प्रवर्द्धमान चारित्र पाया जाता है । परन्तु ऋजुमति प्रतिपाती है, क्योंकि इसके स्वामियों के कषाय के उदय से घटता हुआ ( हीयमान) चारित्र पाया जाता है । * ऐसा नियम है कि विपुलमति मन:पर्ययज्ञान उसी के होता है जो तद्भव मोक्षगामी होते हुए भी क्षपकक्षणी पर चढ़ता है, किन्तु ऋजुमति मन:पर्ययज्ञान के लिए ऐसा कोई नियम नहीं है। वह तद्भवमोक्षगामी के भी हो सकता है और अन्य के भी हो सकता है। इसी प्रकार जो क्षपक श्रेणी १. प. पु. पृ. ६३ । २. सर्वार्थसिद्धि अ. १ सू. ६ । ३. त.सू.अ. १ । ४. व ५, सर्वार्थसिद्धि . १ लू. २४ ।
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
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