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गाधा ४४५-४७
ज्ञानमागरणा,५१७
शङ्का-मन को इन्द्रिय संज्ञा क्यों नहीं दी गई ?
समाधान- नहीं, क्योंकि जिस प्रकार शेष इन्द्रियों का वाय इन्द्रियों से ग्रहण होता है उस प्रकार मन का नहीं होता, इसलिए मन को इन्द्र (आत्मा) का लिंग चिह्न) नहीं कह सकने ।।
मरणपज्जवं च पारणं सत्तसु विरदेसु सत्तइड्ढोणं । एगाविजुदेसु हवे बड्दतविसिट्टचरणेसु ॥४४५।। इंदियणोइंदियजोगादि पेक्खित्तु उजुमदी होदि । रिपरवेक्खिय विउलमदी प्रोहि चा होदि खियमेरग ॥४४६।। पडिवादी पुरण पढमा अप्पडिवादी हु होदि बिविया हु ।
सुद्धो पढमो बोहो सुद्धतरो बिदियबोहो दु ॥४४७।। गाथार्थ - सात गुणस्थान वाले संयमी के, मात ऋडियों में से किसी एक ऋद्धि से युक्त या एकाधिक ऋद्धि से युक्त तथा बर्धमान व विशिष्ट चारित्र को धारण करने वाले के मनःपर्ययज्ञान होता है ।।४४५।। इन्द्रिय, मन और योग की अपेक्षा करके ऋजुमनि मनःपर्ययज्ञान होता है। अवधिज्ञान की तरह बिपुलमति मन पर्ययज्ञान इनकी अपेक्षा के बिना नियम से होता है ।।४४६॥ प्रथम अर्थात् ऋजुमति मनःपर्ययज्ञान प्रतिपाती है। द्वितीय अर्थात् विपुलमति मनःपर्ययज्ञान अप्रतिपाती है। प्रथमबोध (ऋजुमति मनःपर्ययज्ञान) शुद्ध है। द्वितीय बोध अर्थात् विपुलमति मनःपर्ययजान शुद्धतर होता है ।। ४४७।।
विशेषार्थ-"मणपज्जवणाणी पमत्तसंजद-प्पहडिजाक खीसकसायवीदराग-छदमत्था ति॥१२१॥ मन:पर्ययजानी जीव प्रमत्तसंयत से लेकर क्षीरणकषाय वीतराग-द्यस्थ गूणस्थान तक होते हैं ।।१२।। पर्याय और पर्यायी में अभेद की अपेक्षा से मनःपर्ययज्ञान का ही मन:पर्ययज्ञानी रूप से उल्लेख किया है। प्रमत्तसंयत, अप्रमत्तसंयत, अपूर्वकरणमंयत, अनिवृत्तिवरणसंयत, सूक्ष्म साम्पराय संयत, उपशान्त मोह और क्षीणमोह अर्थात् छठे गुणस्थान से बारहवें गुरणस्थान तक इन सात गुग्गस्थानों में मनःपर्यय ज्ञानी जीव होते हैं। सयोगकेवली तेरहवे गुणस्थान में और अयोगकेवलो चौदहवें मुणस्थान इन दो गुणस्थानों में मात्र केवलज्ञान होता है, वहां पर क्षायोपशमिक मनःपर्य गजान नहीं होता।
शङ्का-ऋजुम तिमनःपर्ययज्ञान इन्द्रिय, नोइन्द्रिय और मन, वचन, काय के व्यापार की अपेक्षा किये बिना क्यों नहीं उत्पन्न होता? विपुलमति तो उक्त सभी की अपेक्षा किए बिना ही होता है ?
समाधान---नहीं, क्योंकि मनःपर्ययज्ञानावरणीय कर्भ के क्षयोपशम की यह विचित्रता है।' अतः ऋजुमति मनःपर्यय तो इन्द्रियादि की अपेक्षा करके ही होता है।
१. घ पु. १ पृ. २६०-२६१।
२. श्र. पु. १ पृ. ३६६। ३. घ. पृ. १३ पृ ३३१ ।