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________________ गाथा ८३०-४३४ ज्ञानमार्गगा/५०७ विशेषार्थ - 'कुमार' अर्थात् दस प्रकार के भवनवासी, 'भोम' अर्थात् पाठ प्रकार के वानभ्यंतर देवों का क्षेत्र की अपेक्षा जघन्य अवधिज्ञान पच्चीस योजन होता है। क्योंकि उनके अवधिज्ञान सम्बन्धी क्षेत्र को घनाकार रूप से स्थापित करने पर पच्चीस योजन धन प्रमाण क्षेत्र उपलब्ध होता है। काल की अपेक्षा तो ये कुछ कम एक दिन की बात जानते हैं । क्षेत्र की अपेक्षा ज्योतिषी देवों के जघन्य अवधिज्ञान का प्रमाण संख्यात घनयोजन होता है। इतनी विशेषता है कि व्यन्तरों के जघन्य अवधिज्ञान के क्षेत्र से ज्योतिषियों के जघन्य अवधिज्ञान का होत्र संख्यातगुणा है । इनका काल यद्यपि भवनवासियों के काल से बहत होता है, किन्तु वह उसमें विशेष अधिक होता है, या संख्यातगुणा होता है, यह नहीं जाना जाता क्योकि इस प्रकार का कोई उपदेश इस समय नहीं पाया जाता है। असुर पद से यहाँ प्रसुर नाम के भवनवासी देव लिये गये हैं । उनके उत्कृष्ट क्षेत्र को घनाकार रूप से स्थापित करने पर यह असंख्यात करोड़ योजन होता है । इतनी विशेषता है कि शेष भबनबासी, वानव्यंतर और ज्योतिषी देवों का अवधिज्ञान सम्बन्धी क्षेत्र असंख्यात हजार योजन होता है। नौ प्रकार के भबनवासी, आठ प्रकार के व्यंतर और पांच प्रकार के ज्योतिषी देवों के उत्कृष्ट अवधिज्ञान का क्षेत्र असूरकुमारों के उत्कृष्ट अवधिज्ञान के क्षेत्र से संख्यातगुणाहीन है। क्योंकि हजार की अपेक्षा करोड संख्यात गुणा होता है। असुरकुमारों का उत्कृष्ट काल असंख्यात वर्ष है तथा ज्योतिषियों तक शेष देवों का (नौ प्रकार के भवनवासी, आठ प्रकार के व्यंतर और पांच प्रकार के ज्योतिषी देवों का भी उत्कृष्ट अवधिज्ञान काल असंख्यात वर्ष होता है तथापि वह असुरकूमारों के उत्कृष्ट काल की अपेक्षा संख्यातगणाहीम होता है। भवनवासी. वानव्यन्तर और ज्योतिषी देवों का अवधिज्ञान सम्बन्धी क्षेत्र नीचे की ग्रोर अल्प होता है किन्त तिरछा बहत होता है। इसके अतिरिक्त भवनवासी देव ऊपर देखते हए उत्कृष्ट रूप से मेरु की चलिका के अन्तिम भाग तक देखते हैं।' कम्पवासी देवों के अवधिमान का कथन सक्कीसारखा पढ़मं बिवियं तु सरपक्कुमारमाहिदा । तदियं तु बम्हलांतब सुषकसहस्सारया तुरियं ॥४३०॥ पारगदपारगदवासी प्रारण तह अच्चुदा य पस्संति । पंचमखिदिपेरंत छट्टि गेवेज्जगा देवा ॥४३१॥' सम्वं च लोयगालि पस्संति अणुत्तरेसु जे देवा । सक्खेते य सकम्मे रूबगदमतभागं च ॥४३२॥ कप्पसुराणं सगसगरोहोखेतं विविस्ससोवचयं । प्रोहीदवपमाणं संठाविय धुवहरेण हरे ॥४३३।। सगसगखेत्तपदेससलायपमारणं समप्पदे जाव । तस्थतरणचरिमखडे तत्थतरोहिस्स दध्वं तु ।।४३४॥ १. धवल पु. १३ पृ. ३१४-३१६ तक । २. धवल पु. ६ पृ. २६: पु. १३ पृ. ३१; म.बं. १ पृ. २२; मूलाचार अधिकार १२ गा १७७१ ३. धवल पु. १ पृ २६, पु. १३ पृ. ३१८ : म. बं. पु. १ पृ. २३, मू. चार १२ गा. १०८। ४, धवल पु. १ पृ. २६, पु. १३ पृ. ३१६; म. बं. १ पृ.३।।
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
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