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________________ ५०६/गो. सा. जीवकाण्ड गाथा४२६-४२३ भेद पर्यंत होता है। मनुष्यों में (जघन्य देशावथि से लेकर सर्वावधि पर्यंत) प्रोष के समान है, देवों में अवधिज्ञान का कथन आगे की गाथाओं में यथाक्रम किया जाएगा, सो सुनो।।४२५।। विशेषार्थ- तिरिये' अर्थात् पंचेन्द्रिय तियंच, पंचेन्द्रियतिथंच पर्याप्त और पंचेन्द्रिय तिर्यच योनिनी जीवों को ग्रहण करना चाहिए। जघन्य अवधिज्ञान मनुष्य और नियंचों के होता है, देव और नारकियों के नहीं होता । एक धनलोक का औदारिक शरीर में भाग देने पर जो भागफल अर्थात लब्ध प्राप्त होता है वह जघन्य अवधिज्ञान का विषय भूत द्रव्य होता है। क्षेत्र अंगुल के असंख्यातवें भाग होकर भी सबसे जघन्य अवगाहना प्रसास होता है। मधिज्ञान का काल प्राबली के असंख्यातवें भाग प्रमाण है। यह मनुष्य और पंचेन्द्रिय तिर्यचों के ही होता है। लियंचों में उत्कृष्ट द्रव्य तेजस शरीर प्रमाण, उत्कृष्ट क्षेत्र असंख्यात योजन और उत्कृष्ट काल असंख्यात वर्ष मात्र है। मनुष्यों में उत्कृष्ट द्रव्य एक परमाणु, उत्कृष्ट क्षेत्र व काल असंख्यात लोक है।' अथवा तिर्यंचों में उत्कृष्ट द्रव्य तेजस शरीर के संचयभूत प्रदेशों के प्रमाण होता है। उत्कृष्ट क्षेत्र असंख्यात द्वीप-समुद्र प्रमाग और काल असंख्यात वर्ष होता है। भवनत्रिक में अवधिज्ञान पणुवीसजोयगाई दिवसंतं च य कुमारभोम्माणं । संखेज्जगुणं खेत्तं बहुगं कालं तु जोइसिगे ॥४२६॥' असुराणमसंखेज्जा कोडीनो सेसजोइसंताणं । संखातीदसहस्सा उक्कस्सोहीण विसो दु ॥४२७॥ प्रसुराणमसंखेज्जा बस्सा पुरण सेसजोइसंताएं । तस्संखेज्जदिभागं कालेग य होदि रिणयमेरग ॥४२८।। भवरणतियारामधोधो थोवं तिरियेण होदि बहुगं तु । उड्ढेण भवरणवासी सुरगिरिसिहरोत्ति पस्संति ॥४२६।। गाथार्थ-कुमार अर्थात् भवनवासी तथा भोम (व्यन्तरों) का [जघन्य क्षेत्र पचीस योजन और काल अंतःदिवस (कुछ कम एक दिन) है। ज्योतिषी देवों की अवधि का क्षेत्र संख्यात गुणा और काल बहुत अधिक है ।।४२६।। असुर कुमारों के अवधिज्ञान का उत्कृष्ट क्षेत्र असंख्यात करोड़ योजन तथा ज्योतिषी देवों तक शेष देवों का उत्कृष्ट अवधि का क्षेत्र असंख्यात हजार योजन है ।।४२७।। असुरकुमारों की उत्कृष्ट अवधि का काल असंख्यात वर्ष है। ज्योतिषी पर्यन्त शेष देवों की उत्कृष्ट अवधि का काल नियम से असंख्यातवा भाग है ।।४२८॥ भवनत्रिक के अवधिज्ञान का क्षेत्र नीचे की ओर स्लोव होता है किन्तु तिर्यग रूप से अधिक होता है। भवनवासी ऊपर की सुरगिरि (मेरु) के शिखर पर्यंत देखते (जानते ) हैं ॥४२६।। १. प.पु. ११ पृ. ३२५७-३२८ । २. प.पु. १३ पृ. ३२५-३२६ । ३. प्र.पु. ६ पृ. २५, पु. १३ पृ ३१४ : म.ब.पु.१ पृ २२; मूलाचार पर्यारित अधिकार १२ मा १०१। ४, ध.पु. ६ पृ. २५, पृ. १३ पृ. ३१५ : मूलाचार पर्याप्ति अधिकार १२ गा. ११० । म.बं. पु. १ पृ. २२ ।
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
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