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________________ ५००/गो. सा. जीवकाण्ड गाथा ४१५ विशेषार्थ—सूक्ष्म तेजस्कायिक अपर्याप्तक की जघन्य अवगाहना अंगुल के असंख्यातवें भाग है। उससे असंख्यातगुणी बादर तेजस्कायिक पर्याप्तक की उत्कृष्ट अवगाहना है। उत्कृष्ट अवगाना में से जघन्य अवगाहना को घटाकर और एक मिलाने से तेजस्कायिक जीवों को अवगाहना के विकल्पों का प्रमाण प्राप्त होता है । उससे तेजस्कायिक जीवराशि को गुणित करने पर परमावधि के द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव की शलाकाराशि उत्पन्न होती है। शलाकाओं में से एक रूप कम करना चाहिए। पुनः परमावधि के जघन्य द्रव्य को अवस्थित विरलन से मम खण्ड करके देने पर उनमें एकखण्ड परमावधि का द्वितीय द्रव्यविकल्प होता है। पुनः द्वितीय विकल्प द्रव्य को अवस्थित विरलना (ध्र बहार) से समखण्ड करके देने पर उनमें एक खण्ड तृतीय विकल्प रूप द्रव्य होता है। शलाका में से अन्य एक रूप कम करना चाहिए। चतुर्थ, पंचम, छठे और सातवें आदि विकल्पों को इसी प्रकार ले जाना चाहिए, क्योंकि यहाँ कोई भी विशेषता नहीं है। इस प्रकार परमावधि के द्विचरम विकल्प तक अथवा एक कम शलाका राशि के समाप्त होने तक ले जाना चाहिए। परमावधि के द्विचरम द्रव्य को अवस्थित विरलना (ध्र वहार) से समखण्ड करके देने पर अन्तिम द्रव्य विकल्प है उसकी रूपगत संज्ञा है। वह परमावधि का उत्कृष्ट विषय है। शलाकारों में से एक-एक रूप कम करते-करते सब शलाकायें समाप्त हो जाती हैं । शलाकारूप उन अग्निकायिक जीवों के द्वारा परिचिटमा लिये गये अनट परमानों से प्रारब्ध रूपगत द्रव्यों को परमावधिज्ञान उपलब्ध करता है (जानता है) (यह अभिप्राय है )। इसके द्वारा परमावधिज्ञान के उत्कृष्ट द्रव्य का कथन किया गया है। सव्वावहिस्स एक्को परमाणू होवि शिवियप्पो सो । गंगामहारणइस्स पवाहोव्य धुवो हवे हारो ॥४१५॥ गाथार्थ-सर्वावधि का विषय एक परमाणु मात्र है, वह निर्विकल्प रूप है। भागहार गंगा महानदी के प्रवाह के समान ध्र व है ।।४१५।। विशेषार्थ -परमावधि के उत्कृष्ट द्रव्य को अवस्थित विरलना (ध्र बहार) से समखण्ड करके देने पर रूप के प्रति जो एक-एक परमाणु प्राप्त होता है वह सर्वावधि का विषय है । यहाँ जघन्य उत्कृष्ट और तद्व्यतिरिक्त विकल्प नहीं है, क्योंकि सर्वावधि एक विकल्प रूप है, अर्थात् अन्य विकल्प न होने से बह निर्विकल्प है।" देशावधि ज्ञान के जघन्य द्रव्य को ध्र बहार से खण्डित करने से देशावधि को द्वितीय द्रव्यविकल्प होता है (गा. ३६४) । इस प्रकार देशावधि के जघन्यद्रव्य से लेकर सर्वावधि तक अथवा अवधिज्ञान के उत्कृष्ट द्रव्य परमाणु मात्र प्राप्त होने तक ध्र बहार या अवस्थित विरलना रूप भागाहार प्रवाह रूप में चला जाता है इस लिए गाथा में 'गंगा महानदी के प्रवाह' का दृष्टान्त दिया गया है। १. धवल पु. ९ पृ. ४४-४५, धवल पु. १३ पृ. ३२५। २. धवल पु. ६ पृ. ४४ व ४५, धवल पु. १३ पृ. ३२४ व ३२५। ३. धवल पु.१३ पृ. ३२४ । ४. वल पु.६.४८ ।
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
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