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________________ ४६२ /मो. सा. जीवकाण्ड गाया ३१६-४०३ भाव के द्विचरम विकल्प तक ले जाना चाहिए । पुनः अन्तिम देणावधि के उत्कृष्ट द्रव्य को उत्पन्न करते समय द्विचरम श्रदारिक द्रव्य को छोड़कर एक समय बन्ध के योग्य कार्मण वर्गणा द्रव्य को अवस्थित विरलना से समखण्ड कर के देने पर देशावधि का उत्कृष्ट द्रव्य होता है | देशावधि के द्विचरम भाव को तत्प्रायोग्य संख्यात रूपों से गुरिणत करने पर देशावधि का उत्कृष्ट भाव होता है। क्षेत्र के ऊपर एक आकाशप्रदेश बढ़ने पर देशावधि का उत्कृष्ट क्षेत्र लोक होता है, क्योंकि, वर्गरणा में 'जब तक लोक है तब तक प्रतिपाती है, ऊपर ग्रप्रतिपाती है ऐसा कथन है, अर्थात् क्षेत्र को अपेक्षा उत्कर्ष से लोक को विषय करनेवाला देशावधि प्रतिपाती है और इससे धागे के परमावधि व सर्वावधि प्रप्रतिपाती हैं । द्विचरम काल के ऊपर एक समय का प्रक्षेप करने पर देशावधि का उत्कृष्ट काल एक समय कम पल्य होता है । ऐसी जो अन्य प्राचार्यों के व्याख्यानत्रम की प्ररूपणा है वह युक्ति से घटित नहीं होती, क्योंकि, वैसा मानने पर सर्वार्थसिद्धि-विमानवासी देवों के उत्कृष्ट अवधिद्रव्य से उत्कृष्ट देशावधिद्रव्य के अनन्तगुणत्व का प्रसंग प्राएगा। वह इस प्रकार से लोक के संख्यातवें भाग को शलाका रूप से स्थापित करके मनोद्रव्यवर्गेणा के श्रनन्तवें भाग का विस्रसोपचय रहित अपने अवधिज्ञानावरणकर्मधानुसार भाग पर मन्दिम एक लण्ड को सर्वार्थसिद्धि विमानवासी देव जानता है, परन्तु उत्कृष्ट देशावधिज्ञानी एक बार खण्डित एक समय प्रबद्ध को आनता है। और एक समय प्रबद्ध और नाना समयप्रबद्ध कृत भेद भी नहीं है, क्योंकि यहाँ पल्योपम के प्रसंख्यातवें भाग मात्र उसके गुणकार की प्रधानता का अभाव है। यह देवों के उत्कृष्ट द्रव्य की उत्पादनविधि प्रसिद्ध नहीं है, क्योंकि, वह अपने क्षेत्र में से एक प्रदेश उत्तरोत्तर कम करते हुए अपने अवधिज्ञानावरणकर्म का अनन्तवाँ भाग है' इस सूत्र से सिद्ध है । इस कारण जघन्य द्रव्य से भागे उसके योग्य विकल्पों के बीत जाने पर विस्रसोपचय सहित श्रदारिक द्रव्य को छोड़कर विस्रसोपचय रहित कार्मण समयप्रबद्ध देना चाहिए, क्योंकि, प्रदारिक विस्रसोपचयों से कार्मण विस्रसोपचय अनन्तगुणे हैं और यह बात प्रसिद्ध भी नहीं है, क्योंकि, “प्रौदारिक शरीर का विस्रसोपचय सबसे स्तोक है, उससे वैऋियिक शरीर का विसोपचय अनन्तगुणा है, उससे शाहारक शरीर का विस्रसोपचय अनन्तगुणा है, उससे तेजस शरीर का विस्त्रसोश्चय अनन्तगुणा है, उससे कार्मण शरीर का बिस्रसोपचय श्रनन्तगुणा है" इस प्रकार वर्गरासूत्र से उसे अनन्तगुणत्व सिद्ध है । शङ्का - विxसोपचयों को छोड़कर श्रीदारिक परमाणुओं को ही अवस्थित विरलना से क्यों नहीं देते ? समाधान--- नहीं देते, क्योंकि, वे विरलन राशि से अनन्तगुणे हीन हैं, ऐसा गुरु का उपदेश है । शङ्का-विरलन राशि से कार्मण द्रव्य अनन्तगुणा है, यह कैसे जाना जाता है ? समाधान – 'आहार वर्गणा के द्रव्य स्तोक हैं, तेजस वर्गणा के द्रव्य उससे अनन्तगुरणे हैं, भाषा वर्गणा के द्रव्य उससे अनन्तगुणे हैं, मनोत्रगंरेरणा के द्रव्य अनन्तगुणे हैं, कार्मण वर्गेणा के द्रव्य अनन्तगुणे हैं। इस वर्गणासूत्र से बह जाना जाता है । पूर्व के समान असंख्यात द्रव्य और भाव के विकल्पों के बीत जाने पर जब जघन्य श्रवधिक्षेत्र
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
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