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________________ गाथा ३९६-४०३ · · ज्ञानमार्गरणा/४६१ प्रमाण क्षेत्रविकल्पों के बीतने पर काल में एक समय बढ़ता है, ऐसा कहना चाहिए, क्योंकि, दोनों ही प्रकारों से वृद्धि होने का कोई विरोध नहीं है। • जघन्य काल को कुछ कम प्रावली में से कम कर के शेष का विरलन कर जघन्य क्षेत्र से हीन धनांमुल को समखण्ड करके प्रत्येक समय के ऊपर देकर अवस्थित थ अनवस्थित वृद्धि के विकल्पों में अंगुल के प्रसंख्यातवें भाग व संख्यातवें भाग मात्र क्षेत्रविकल्पों के बीतनेपर काल में एक समय बढ़ता है, ऐसी पूर्व के समान प्ररूपणा करनी चाहिए। इस प्रकार जाकर अनुत्तर विमानवासी देव काल की अपेक्षा पल्प म के असंख्यातवें भाग और धोत्र को अपेक्षा समस्त लोकनाली को जानते हैं, अतएव जघन्य काल से रहित पल्मोपम के असंख्यातवें भाग का विरलन कर जघन्य क्षेत्र से हीन जघन्य प्रादि प्रध्वान को समखण्ड करके देनेपर प्रत्येक रूप के प्रति असंख्थात जगत्प्रतर मात्र लोक का असंख्यातवाँ भाग प्राप्त होता है। यहाँ एकरूपधरित मात्र क्षेत्रविकल्पों के बीत जानेपर काल में एक समय बढ़ता है, ऐसा नहीं कहना चाहिए, क्योंकि, इस प्रकार अधस्तन क्षेत्र और काल के अभाव का प्रसंग पाएगा। इसलिए घनांगुल के असंख्यातवें भाग, कहीं पर धनांगुल के संख्यातवें भाग, कहीं घनांगुल, कहीं धनांगुल के वर्ग, इस प्रकार जाकर कहीं पर जगणी, कहीं जगत्प्रतर और कहीं पर असंख्यात जगत्प्रतरों के बीतनेपर एक समय बढ़ता है। ऐसा कहना चाहिए। इसलिए उत्कृष्ट क्षेत्र और काल की उत्पत्ति में कोई विरोध नहीं है, यह सिद्ध हुआ । अब इस प्रकार तब तक ले जाना चाहिए जब तक द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव की द्विचरम समान वृद्धि नहीं प्राप्त होती । शङ्का-द्विचरम समानवृद्धि किसे कहते हैं ? समाधान-जिस स्थान में चारों की युगपत् वृद्धि होती है उसकी समान वृद्धि ऐसी संज्ञा है। उसमें चरम समानबृद्धि को छोड़कर उससे नीचे की वृद्धि द्वि चरम समानवृद्धि है। उतना अध्वान जाकर वहाँ जो कुछ भी भेद है उसे कहते हैं-वहाँ हिचरम सभानवृद्धिसे ऊपर कितने काल विकल्प हैं ? एक समय रूप एक विकल्प । किन्तु क्षेत्रविकल्प असंख्यात श्रेणी मात्र, अथवा संख्यात श्रेणी मात्र, अथवा जगश्रेणी मात्र, अथवा घेणी के प्रथम वर्गमूल मात्र, अथवा द्वितीय वर्गमूल मात्र, अथवा धनांगुल मात्र, अथवा घनांगुल के [संख्यातवें भाग मात्र, अथवा घमांगुल के ] असंख्यातवें भाग मात्र क्या होते हैं या नहीं होते, ऐसा पूछने पर उत्तर देते हैं कि वे अंगुल के असंख्यातवें भाग मात्र ही होते हैं : कारण कि ऐसा प्राचार्यपरम्परागत-उपदेश है। अथवा, उक्त धोत्र विकल्पों के विषय में ज्ञान नहीं है, क्योंकि तत्सम्बन्धी युक्ति ब सूत्र का प्रभाव है। क्षेत्रविकल्पों से द्रव्य और भाव के विकल्प' असंख्यातगुरणे हैं। गुणकार अंगुल का असंख्यातवाँ भाग है, क्योंकि, अंगुल के असंख्यातवें भाग मात्र द्रब्य और भाव के विकल्पों के बीत जानेपर क्षेत्र में एक आकाशप्रदेश की बुद्धि होती है। इस प्रकार द्विचरम समानबुद्धि की प्ररूपणा की गई है। पुनः विचरम समानवृद्धि के औदारिक द्रव्य को अवस्थित बिरन्नना से समखण्ड करके देनेपर उससे आगे का द्रव्य विकल्प होता है। विचरम समानवृद्धि के भाव को उसके योग्य असंख्यात रूपों से गणित करनेपर तदनन्तर भावविकल्प होता है। इस प्रकार अंगुल के असंख्यातव असंख्यातवें भाग मात्र द्रव्य व भाव के विकल्पों के बीत जानेपर क्षेत्रमें एक प्राकाशप्रदेश बढ़ता है। इस प्रकार इस क्रमसे द्रव्य और
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
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