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________________ ४८०/गो. सा. जीवकाण्ड गाथा ३६६ शङ्का--भाषावर्गणा की अवगाहना तेजसवर्गरणा की अवगाहना से असंख्यातमुणी हीन होती है, यह किस प्रमाण से जाना जाता है ? समाधान -- वह "कार्मणशरीरद्रध्यवर्गणा की अवगाहना सबसे स्तोक होती है। उससे मनोद्रच्यवर्गणा की अवगाहना असंख्यातगुणी होती है। उससे भाषाद्रव्यवर्गणा की अवगाहना असंख्यातगुणी होती है। उससे तेजस शरीरद्रव्यवर्गणा की अवगाहना असंख्यातगुगी होती है। उससे पाहारकशरीरद्रव्यवर्गणा की अवगाहना असंख्यातगुणी होती है। उससे वैफियिक शरीर द्रव्य वर्गणा की अवगाहना असंख्यातगुणी होती है। उससे औदारिकशरीरद्रव्यवर्गणा की अवगाहना असंख्यातगुरणी होती है।" इस अल्पबहुत्व से जाना जाता है। किन्तु. इसकी प्रधानता नहीं है, क्योंकि अवगाहना को अल्पता ज्ञान के बड़ेन का कारण नहीं है, यह पहले कहा जा चुका है। इसलिए सूक्ष्मता ही भाषाज्ञान के बड़ेपन का कारण है, ऐसा यहाँ ग्रहण करना चाहिए। शङ्कही सूक्ष्म र का नया है? समाधान—जिसका ग्रहण करना कठिन हो, वह सूक्ष्म कहलाता है। यह अर्थ अन्यत्र भी कहना चाहिए । शा-गाथासूत्र में 'च' शब्द किसलिए पाया है ? समाधान–बह अनुक्त अर्थ का समुच्चय करने के लिए गाया है । इसलिए मनोद्रव्य सम्बन्धी एक वर्गणा को जानने वाला क्षेत्र की अपेक्षा असंख्यात द्वीप-समुद्रों को और काल की अपेक्षा असंख्यात वर्षों को जानता है, इस अर्थ का यहाँ ग्रहण होता है। इतनी विशेषता है कि यह भाषावर्गणा सम्बन्धी क्षेत्र और काल की अपेक्षा असंख्यातगुरो क्षेत्र और काल को जानता है। यद्यपि भाषा की एकवर्गणा के प्रदेशों से अनन्तगुरणे प्रदेशों द्वारा एक मनोद्रव्यवर्गरणा निष्पन्न होती है, तो भी मनोद्रव्य वगंगा की अवगाहना भाषावर्गणा की अवगाहना से असंख्यातगुणी हीन होती है, इसलिए मनोद्रव्यवर्गणा को विषय करने वाला अवधिज्ञान बड़ा होता है, यह कहा है। कामणद्रव्यवर्गणा को जानने वाला क्षेत्र की अपेक्षा असंख्यात द्वीपसमुद्रों को और काल की अपेक्षा असंन्यातवर्षों को जानता है। इतनी विशेषता है कि एक मनोद्रव्य वर्गणा को विषय करने वाले अवधिज्ञान के क्षेत्र और काल की अपेक्षा एक कार्मणद्रव्यर्गणा को विषय करने वाले अवधिज्ञान का क्षेत्र और काल असंख्यातगुणर होला है । ___ कार्मणवर्गरणा द्रव्य को अवस्थित विरलन (ध्र बहार) पर सम खाड करके देने पर देशावधि का उत्कृष्ट द्रव्य होता है।' ____ द्वन्य प्रादि विकल्पों की संख्या का प्रमाण अंगुलप्रसंखभागे व्यषियप्पे गवे दु खेत्तम्हि । एगागासपदेसो वड्ढदि संपुण्णलोगोत्ति ॥३६॥ १. कम्मदय वग्गगादब्बमध दिवविरलाए समाह करियदिगो देसोहि उक्कस्स दवं होदि । घ. (पृ. ३५ पंक्ति १० ।
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
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