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________________ ४८६ / गो. मा. जीवकाण्ड एदम्हि विभज्जते दुचरिमदेसावहिम्मि वग्गरणयं । चरिमे कम्मइयसि गिवग्गण मिगिवार भजिदं तु ॥ ३६८ ॥ गाथा - देशावधि के जघन्य द्रव्य में एक बार ध्रुवहार का भाग देने पर देशावधि के द्वितीय विकल्प का द्रव्य प्राप्त होता है। द्वितीय विकल्प में ध्रुबहार का भाग देने पर तृतीय विकल्प का द्रव्य प्राप्त होता है । इस प्रकार क्रम से ध्रुवहार का भाग देने पर असंख्यात विकल्प उत्पन्न करने चाहिए ।। ३६४ || देणावधि के मध्यभेदों का विषय जहाँ पर विस्रसोपचय सहित तेजस शरीर, विसोपचय सहित कार्मरण शरीर, विसोपचय रहित तैजसवर्गणा, विसोपचय रहित भाषावर्गणा तथा वित्रोपचय रहित मनोवर्गणा होता है वहाँ पर देशावधि का क्षेत्र प्रसंख्यात द्वीप समुद्र और काल असंख्यात वर्ष होता है किन्तु पूर्व-पूर्व की अपेक्षा क्षेत्र व काल क्रम से असंख्यात गुणा असंख्यात गुणा होता है ।। ३६५ - ३६६ ।। इसके आगे अवधिज्ञान का विषय वित्रसोपचय रहित कार्मल का एक समयप्रबद्ध होता है । इस प्रकार जब तक सर्वावधि का द्रव्य ( एक परमाणु) प्राप्त न हो तब तक ध्रुबहार का भाग देते जाना चाहिए ।।३६७।। इस समय प्रबद्ध को ध्रुबहार से भाग देने पर द्विरम देशावधि की कार्मणवगंरेरणा प्राप्त होती है। इसमें बहार का भाग देने पर देणावधि के चरम भेद का प्रश्य प्राप्त होता है गाथा ३६४-३६८ विशेषार्थ - देशावधि और परमावधि के द्रव्य की प्ररूपणा में मेरु पर्वत के समान अवस्थित मनोद्रव्यवर्गणा के अनन्त भाग (बहार ) का विरलन करके उसके ऊपर देशावधि के जघन्य द्रव्य को समखण्ड करके देने पर उसमें एकरूपधरित खण्ड का द्वितीय विकल्प होता है; क्योंकि पूर्वोक्त जघन्य द्रव्य की अपेक्षा करके एक, दो परमाणु प्रादिकों से होन पुद्गल स्कन्ध के ग्रहण करने में समर्थं ऐसे देशावधि ज्ञान के निमित्तभूत अवधिज्ञानावरण के क्षयोपशम का अभाव है, क्योंकि 'अवधि ज्ञानावरण कर्म की असख्यात लोकप्रमाण ही प्रकृतियाँ हैं' ऐसा वर्गणासूत्र ("ओहिणागावरणस्स श्रसंखेज्जलोग मेत्तीश्रो चैव पयडीओ ।" धवल पु. १३ पृ. २८६ ) है । पश्चात् बहुरूपर्धारित खण्डों को छोड़कर एकरूप धरित द्वितीय विकल्प रूप द्रव्य को अबस्थित भागहार ( धबहार ) के प्रत्येक रूप के ऊपर समखण्ड करके देने पर उनमें एक खण्ड तृतीय विकल्प रूप द्रव्य होता है। क्षेत्र और काल जघन्य ही रहते हैं । पुनः शेष खण्डों को छोड़ करके एकरूपधरित तृतीय विकल्परूप द्रव्य को अवस्थित विरलना (ध. बहार ) पर समखंड करके देने पर उनमें से एक खण्ड पर प्राप्त द्रव्य चतुर्थ विकल्प रूप द्रव्य होता है । इस प्रकार अभ्रान्त होकर, पाँच, छह, सात यादि अंगुल के प्रसंख्यातवें भाग मात्र द्रव्य के विकल्प हो जाने पर क्षेत्र का द्वितीय विकल्प होता है । परन्तु काल जघन्य ही रहता है ।" इसके आगे मध्य विकल्पों अर्थात् देशावधि के मध्य विकल्पों में अवधिज्ञान का विषय क्रम से इस प्रकार है सेया कम्मइय सरीरं तेया दव्वं च ageमसंखेज्जा दीव-समुद्दा य भासदध्वं च । वासा य ।। ३ तेजस शरीर, कार्मण शरीर तेजोद्रव्य (विश्वसोपचयरहित तैजस वर्गणा ), भाषाद्रव्य ( विसोपचय रहित भाषावगंणा) और मनोवर्गणा को जानता है । वहाँ क्ष ेत्र असंख्यात द्वीप समुद्र और काल असंख्यात वर्ष प्रमाण होता है । १. ध. पु. ६ पृ. २८-५६ । २. महाबंध पु. १ पृ. २२ प. पु. १३ पृ. ३१० । .
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
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