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________________ ४८४/गो. मा. जीवकाण्ड गाथा ३१२-२६३ एक उ पस में बल्योपके प्रसंख्यातवें भाग का भाग देने पर जो एक खण्ड प्रमाण क्षेत्र पाता है, उतनी तीसरे समय में ग्राहार को ग्रहण करने वाले और तीसरे समय में तद्भवस्थ हुए सुक्ष्म निगोद लब्ध्यपर्यास्तक की जघन्य अवगाहना होती है । जितनी वह अवगाहना होती है, उतना देशावधिज्ञान का जघन्य क्षेत्र होता है।' देशावधि का उत्कृष्ट क्षेत्र लोकप्रमाण है । इस उत्कृष्ट उत्सेघघनांगुल क्षेत्र में से जघन्य क्षेत्र को घटाने पर [ लोक- - -क्षेत्रविशेष प्राप्त होता पल्य असंख्यात है जो असंख्यात प्रमाण है, क्योंकि समस्त लोकाकाश के प्रदेश असंख्यात हैं। पूर्व-पूर्व के द्रव्यविकल्प को प्र.वहार से भाजित करने पर उत्तरद्रव्य विकल्प उत्पन्न होता है । अंगुल के असंख्यातवें भाग मात्र द्रव्य विकल्प हो जाने के पश्चात् देशावधि के क्षेत्रसम्बन्धी विकल्प में एक आकाशप्रदेश की वृद्धि होती है। क्षेत्र के एक विकल्प होने के लिए अंगुल के असंख्यातवें भाग मात्र द्रव्य विकल्प होते हैं तो समस्त क्षेत्रविकल्प होने के लिए अंगुल के असंख्यातवें भाग से गुणित क्षेत्रविकल्प प्रमाण द्रव्यविकल्प होते हैं। इस प्रकार क्षेत्रविकल्प गुणित अंगुल के असंख्यातवें भाग" प्रमाण द्रव्य विकल्प होते हैं । इस प्रकार गाथा ३८६ के अनुसार दो क्रम असंख्यातप्रमाण द्रव्यविकल्प मात्र ध्र बहारों को परस्पर गुणा करने से कर्मवर्गणा गुणाकार प्राप्त होता है । ____ कर्मवर्गणा गुणाकार का प्रपारण यग्गरणरासिपमारगं सिवाणंतिमपमारण मेत्तं पि । दुगसहियपरमभेद-पमारणवहाराण संवग्गो ॥३९२॥ परमावहिस्स भेदा सगोगाहणवियप्पहवतेऊ । इदि धुवहारं वग्गरणगुरणगारं वगणं जाणे ॥३६३।। गाथार्य-कार्मणवर्गणा राशि का प्रमाण सिद्धों के अनन्तवें भाग मात्र है तथापि दो अधिक परमावधि के भेद प्रमाण ध्र वहार को संवर्ग करने पर भी कार्मणवर्गणा का प्रमारण प्राप्त हो जाता है |॥३६३।। तेजस्कायिक जीवों की अवगाहना के जितने विकल्प हैं उनसे तेजस्कायिक जीवराशि को गुणा करने पर जो प्रमाण प्राप्त हो उतने परमावधि के द्रव्य विकल्प हैं । इस प्रकार'ध्र बहार बर्गमा गुणाकार व वर्ग का प्रमाण जाना जाता है ।।३६२-३६३।। विशेषार्थ—सूक्ष्म तेजस्कायिक अपर्याप्तक की जघन्य अवगाहना अंगुल के असंख्यातवें भाग १. "जद्देही जात्रद्धा एसा प्रोगाहरणा तहेट्टी तात्रद्धा चेव जण्णिमा प्रोही खेसदो होदी।” [धवल पु. १३ पृ. ३०२]। २. "देसोहि उक्कम्सखेत्तं लोगमेतं" धवल पु. १३ पृ. २८] "असंख्येमाः प्रदेशाः धर्माधर्मकजीवानाम् ।।८।। लोकाकाशे प्रवगाहः ॥१२॥ धर्मावर्मयोः कृत्स्ने ।।१३॥" [तस्वार्थ सूत्र प्र. ५] ३. "गुलम्म नसंखेज्जदि भागमेत्ता दय-वियप्पा उपाएयब्वा । तदो जहपण खेलरसुयरिएगो प्रागारापदेसी वतायेदवो। एवं ववादिदे खेत्तस्स किदिवियप्पो होदि ।" [धवल पु.६ पृ. २६] ।
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
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