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________________ माथा ३६०-३६१ ज्ञानमार्गणा/८३ उपर्युक्त गाथाओं में जिसको ध्र वहार कहा गया है उसको धवल ग्रन्थ में अवस्थित-विरलन राशि कहा गया है। उपर्युक्त गाथाओं में ध्र बहार का प्रमाण दो प्रकार से बतलाया गया है, मनोवर्गणा का अनन्तवाँ भाग, दूसरा सिद्धों का अनन्तवाँ भाग। यद्यपि समयप्रबद्ध प्राप्त करने के लिये भी कार्मण वर्गणाओं को सिद्धों के अनन्तवें भाग से गुरगा करना पड़ता है और एक कार्मरणवर्गणा में सिद्धों के अनन्तवें भाग प्रमाण कर्मवर्ग होता है तथापि ध्र वहार प्रमाण सम्बन्धी सिद्धी का अनन्तवा भाग इस अनन्तवें भाग से भिन्न है । उपयुक्त छह गाथाओं में ध्र वहार (अयस्थित विरलनराशि) के प्रमाण को नाना प्रकार से सिद्ध किया गया है किन्तु उन मव का निष्कर्ष यह है कि वह प्रमाण मनोवर्गरणा के अनन्त-भाग अथवा सिद्धों के अनन्तवें भाग है। देशावधि ज्ञान के द्वितीय आदि विकल्पों का कथन गाथा ३६४ अादि में किया जाएगा। इन बिकल्पों को प्राप्त करने के लिए इस ध्र वहार से ही भाग दिया गया है। समयप्रबद्ध के लिए जो सिद्धराशि का अनन्त वाँ भाग है उसका भी अनन्तवाँ भाग ध्र वहार का प्रमाण है। अभिप्राय यह है कि समयबद्ध कार्मगवर्गणा x सिद्धों का अनन्तवा भाग प्रमाण अनन्त । अब यहां इस समीकरण में जो "सिद्धों का अनन्तवाँ भाग" कहा है उसका भी अनन्तवा भाग स्वरूप ध्र बहार है । देशावधिज्ञान के विषयभुत द्रव्य की अपेक्षा जितने भेद हैं, उनमें से दो कम करके जो शेष बचे उतनी बार नवहार को परस्पर गूण कसेसेकामावण को मार सिद्धका अनन्तवा भाग प्राप्त होता है। देशावधि का द्रव्य-अपेक्षा द्विचरमभेद का विषय कामरावर्गणा है। अतः चरमभेद कम करने से द्विचरम भेद प्राप्त होता है और जघन्यभेद गुणाकार से प्राप्त हुआ नहीं। अतः देशावधि का जघन्य भेद और चरमभेद इन दो को द्रव्य सम्बन्धी विकल्पों में से कम किया गया है। कार्मण वर्गरणा का गुणाकार तथा देशावधि के क्षेत्रविकल्पों का प्रमाण अंगुल असंखगुरिणदा खेत्तवियप्पा य दबभेवा छ । खेतवियप्पा अवरुषकस्सविसेसं हवे एस्थ ॥३६०।। अंगुलप्रसंखभागं अधरं उक्कस्तयं हवे लोगो । इदि बग्गरणगुणगारो असंखधुवहारसंवग्गो ।।३६१।। गाथार्थ –अंगुल का असंख्यातवाँ भाग देशावधि का जघन्य क्षेत्र है और लोकाकाश उत्कृष्ट क्षत्र है । जघन्यक्षेत्र से उत्कृष्टक्षेत्र जितना विशेष अधिक है, यहाँ पर उतने क्षेत्र विकल्प हैं । उन क्षेत्रविकल्पों को अंगुल के असंख्यातवें भाग से गुणा करने पर देशावधि के द्रव्य विकल्पों का प्रमाण प्राप्त होता है। इस प्रकार असंख्यात ध्र वहारों का संवर्ग करने पर कार्मणवर्गरणा का गुणाकार होता है ।।३६०-३६१॥ विशेषार्थ— यहाँ पर देशावधि के क्षेत्रविकल्पों के आधार से देशावधि के द्रव्य विकल्पों का प्रमारण बतलाया गया है। देशावधि का जघन्य क्षेत्र गा. ३७८ में कहा जा चुका है। तत्सम्बन्धी निम्नलिखित उपयोगी गाथा है-- योगाहरणा जहण्णा णियमा दु सुहमणिगोदजीवस्स । जद्देही सद्देही जहणिया खेत्तदो प्रोही ॥३॥ १. धवल पु. १३ पृ. ३.१ व पु. १ पृ. १६, महाबंध पु. १ पृ. २१ ।
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
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