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________________ ४०२/गो. सा. जीवकाण्ड गाथा ३८४-३८६ धुवहारस्स पमाणं सिद्धाणंतिमपमारणमेतं पि । समयपबद्धरिणमित्तं कम्मरणयगरणगरगादो दु ॥३८८॥ होदि अणंतिमभागो तगणगारो वि देसमोहिस्स । दोऊरणवश्वभेद-पमारणद्ध बहार-संवग्गो ॥३६॥ गाथार्थ -- अवधिज्ञान के जधन्यद्रव्य के ऊपर दूसरा द्रव्य विकल्प प्राप्त करने के लिये जघन्यद्रव्य को ध्रुवहार से खण्डित कर एक खण्डप्रमाण द्रव्य का दूसरा भेद होता है । वह ध्र वहार सिद्धों के अनन्तवें भाग और अभव्यों से अनन्तगुणा होता है ।।३८४॥ यह ध्र वहार कर्मवर्गणा की संख्या प्राप्त करने के लिए गुणकार है, झमवर्गीको इस ध्रुवहार से गुरणा करने पर समयप्रबद्ध प्रमाण प्राप्त होता है जो अवधिज्ञान का विषय है और अवधिज्ञान इस समयप्रबद्ध को जानता है ॥३८५।। जघन्यद्रध्य मनोवर्गणा से उत्कृष्टद्रव्य मनोवर्गण। जितनी अधिक हैं उसमें एक मिलाने पर मनोवर्गणा के विकल्प (भेदों) का प्रमाण प्राप्त होता है। उसका अनन्तवा भाग ध्र बहार है ।।३८६।। जघन्य मनोवगणा अनन्त प्रमाण रूप है और उसका अनन्तवा भाग अधिक उत्कृष्ट मनोवर्गणा है। इस प्रकार मनोवर्गणा के भेदों का अनन्तवाँ भाग द्रव्य के लिए ध्रवार है ॥३८७॥ सिद्धों के अनन्तवें भाग प्रमाण मात्र ध्र बहार का प्रमाण है। अथवा समयबद्ध के निमित्त कर्मवर्गणा का जो गुणाकार है उसका अनन्तवाँ भाग है । वह गुणाकार भी दो कम देशावधि के द्रव्य विकल्प मात्र ध्र बहार को परस्पर संवर्ग करने से प्राप्त होता है ।।३८८-३८६।। विशेषार्थ-तिथंच और मनुष्यों में विनसोपचय सहित प्रौदारिक शरीर को घनलोक से भाजित करने पर जो एकभाग लब्ध प्राप्त होता है, वह जघन्य अवधिज्ञान का द्रव्य है। मनोद्रव्यवर्गगा के अनन्तवें भागरूप अवस्थित विरल न राशि (ध्र बहार) का विरलन करके उसपर जघन्य अवधिज्ञान के द्रव्य को समान खण्ड करके देने पर (यानी ध्र बहार से भाजित करने पर) जो एक बिरलन के प्रति द्रव्य प्राप्त होता है (जो लब्ध प्राप्त होता है) वह दूसरे देशावधिज्ञान का द्रव्य होता है। क्योंकि पूर्वोक्त जघन्यद्रव्य की अपेक्षा करके एक दो परमाणु यादिकों से हीन पुद्गलस्कन्धों के ग्रहण करने में समर्थ, ऐसे ज्ञान के निमित्तभूत अवधिशानावरण के क्षयोपशम का प्रभाव है। शङ्का-यह कैसे जाना जाता है? समाधान–'अवधिज्ञानावररण की असंख्यात लोकप्रमाण प्रकृतियाँ हैं । इस वर्गणासूत्र से जाना जाता है। __ भाव का द्वितीय विकलर लाने के लिए जिन (श्रुतकेवली) द्वारा देखा गया है स्वरूप जिस का, ऐसे असंख्यात से गुणा करना चाहिए, अर्थात् भाव की अपेक्षा देशावधि का द्वितीय विकल्प प्रथम विकल्प से असंख्यात गुणा है। क्षेत्र और काल जघन्य ही रहते हैं, क्योंकि उनकी वृद्धि का अभाब हैं । १. धवल पु.१३ पृ. ३२२ धवल पु.६ पृ. २८ । २. "मोहिणाणा वरणीयरस कम्मस्स प्रजिज्जाश्रो पमडीयो ।। ५.२।।" [प्र. पु. १३ पृ. २८६] । ३. घ. पु. पृ. १८
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
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